शुक्रवार, 27 मार्च 2009

१०४-सबके ह्रदय में

मैंने अब तक स्वयम को देखा ही नही
पता नही
मेरा घर मेरे बारे मे क्या सोचता होगा
अशोक के पेडो को
या सूर्य-मुखी के पौधों को
मेरा इन्तजार होगा
मेरा शहर मुझे ढूंढता  होगा
सड़कों  पर
भीड़ मे
दफ्तर के उम्र कैद से छूटकर
बाहर आने पर
आज कहूँगा पत्नी से
पूछो मुझसे -
की मै तुम्हे कितना चाहता हू ...?
कालेज को पता नही होगा
एक लड़के या उन प्रेम कविताओ के बारे मे अब-तक
बरसों  बाद मिले
पुराने मित्र की तरह
चौराहे पर खड़ा  नीम
क्या पूछेगा मुझसे
मेरा नाम
कहेगा कौन हो तुम

मै जूतों को
मोजों  को उतार कर 
अब  नंगें  पाँव चलना चाहता हूँ 
रूमालों की  की तरह छूटे हुए 
अपनों  से मिलना चाहता हूँ 
पत्नी के हाथ  मे रखी  हुई चाय में 
शक्कर  की तरह घुल जाना  चाहता हूँ 
सबके ह्रदय में 
शब्दों  के सच सा
भर जाना चाहता हूँ 
अपना असली चेहरा उन्हें
दिखलाना चाहता हूँ  

किशोर कुमार खोरेन्द्र 

१०३-अंत के अंत मे -

हाँ
यही सच है
किनारे टूटते रहे
पर किनारा रहेगा ही
लहरे आती रहे
पर उनका लौटना रहेगा ही
गिनते -गिनते लहरों को
लेकिन -
रेत की तरह बिछता हूवा तट
लहर न बन पायेगा /
उसके सीने पर
अपने माथे पर
सूरज की तरह
उभर आए बिन्दीयाँ के रंग को
बिखेर जायेगी -जरुर संध्या /
मुडती हवी देह सी
रेत पर लिखी यह कौन सी
भाषा है .....?
हवा नही बताएगी कभी
हाँ ,यही सच है -
समझ लो यही प्यार है /
खोजते रहो उसे
जैसे -एक पुरूष
एक औरत
तलाशते है एक दुसरे को
अभी ,इसी समय , या आजीवन
आदि से अंत तक यही होगा /
फ़िर
क्या अंत के अंत मे ......?
लहरे तटों मे समा जायेंगी
और वो तमाम बिछडे
हुवे -साथी मिलकर - बर्फ की तरह pighal जायेंगे
और tab प्रेम का सागर यह -नया
manushy के bhitar nso मे bhar jaayega
tab भी sdko पर लोग होंगे
पर प्रेम bhii होगा {kishor kumar khorendra }

मुझे तुम याद हो गए

कितने दिन और कितनी ..रात हो गए
भूलने की कोशिश मे
मुझे तुम याद हो गए /
मै पुरूष आधा
मन मेबसी रहती
इसलिए -
सदैव एक पवित्र राधा
राधा सी तुम एक मन्त्र -जाप हो गए //
रूप नही ,आकार नही
देह नही ,साकार नही
चेतना मे प्रेम का
हम एकाकार भावः हो गए ///
हर आँखों मे
चित्र अनंत समाया
हर मन के पास मगर
प्यार लौट कर
अंत मे एक -जैसा आया
उस सच्चे प्यार को पाकर
लगता है
हमे -तुम भव -सागर पार हो गए //// {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

रविवार, 22 मार्च 2009

१०१--लेकीन तुम्हें याद करते ही -

क्या मै ठीक ठीक वहीँ  हूँ  जो मैं  होना चाहता था 
या हो गया हूँ  वही जो मै अब होना चाहता हूँ  
काई को हटाते ही जल सा स्वच्छ  
किरणों से भरा उज्जवल 
या बूंदों से नम ,हवा मे बसी मे मिट्टी की सुगंध 
या सागौन  के पत्तो से आच्छादित भरा भरा सा ,सूना हरा वन 
मैं  सोचता हूँ  मैं  योगीक हूँ  
अखंड ,अविरल ,-प्रवाह हूँ  
लेकीन तुम्हें याद करते ही - 
जुदाई में  .....
टीलो की तरह रेगिस्तान में  भटकता हुआ  नजर आता हूँ  
नमक की तरह पसीने से तर हो जाता हूँ  
स्वयं  कभी चिता में  ...चन्दन लकड़ियों सा -
जलता हुआ  पाता हूँ  - 
और टूटे हुए  मिश्रित संयोग सा 
कोयले के टुकड़ों  की तरह 
यहाँ -वहां स्वयं बिखर जाता  जाता हूँ  
लेकीन तुम्हारे प्यार की आंच से तप्त लावे की तरह 
बहता हुआ  मुझ स्वप्न  को पुन: साकार होने में  
अपने बिखराव को समेटने में क्या बरसो लग जायेंगे ......
टहनियों पर उगे 
हरे रंग या पौधे मे खिले गुलाबी रंग 
या देह मे उभर आये -गेन्हुवा रंग 
सबरंग 
पता नही तुमसे कब मिलकर 
फिर  -थिरकेंगे मेरे अंग -अंग 
किशोर कुमार खोरेन्द्र

शुक्रवार, 20 मार्च 2009

प्रतिक्रिया {"किसी न पढ़ी गयी पुस्तक की तरह "पर }

१-RaJiV sHaRMa:
धन्यबाद सर ....आप का हर शब्द मुझे छु जाता है .. २-----deepak:
वाह वाह ...........बहुत बढ़िया सर ॥ ३-VINOD BISSA:
जो सोचा पाया जग में पर ना पाया तुझसा दूजा ..... ४-VINOD BISSA:
शानदार रचना है किशोर जी ..... शुभकामनाएं..... ५-Girish:
अदभुतI liked it. -----६-Jenny:
वाह !!! बहुत खुबसूरत कविता है, मन की अभिलाषा और अतृप्ति की बात, बहुत खूब. -----७-Anita:
Dhanawad Kishor Ji...Shabnam Ji ko jaroor pasand aayega...Aap apni poems bhi wahan post kar sakte hain ... Aapki "Aurat" kavita bhi mujhay bahut pasand aayi thi...-मन जिसका मायका ...देह ससुराल ... bahut touching line hai ye... hum ladkiyan hi samajh sakti hain ki kitna dard chupa hai is pankti me... :(Keep it up!! Thanks!! Jai Sri Krishna!!

१०१-तुम रहती हो

तुम रहती हो

संग मेरे भरे -भरे

तट की बाहों मे जैसे नदी का जल बहे

jaanaa

१००-एक कविता के बाद भी

एक कविता के बाद भी
बची रह जाती है
मेरे पास लिखने के लिए
या फीर
पढ़ने के लिए -
अनेक कविताएं .......
क्या कविताये भी मुझे
धुडती है - जैसे
गुलाब धुड लेता है एक पौधा
या
एक पौधा धुड लेता है अनेक गुलाब
घोसले को चाहिए चिडिया
और चिडियों को चाहिए घोसला
तो क्या स्कुल को मिल जायेंगे वो सारे बच्चे
जिन्हें जानना है सच को
और सच को मिल जायेंगे वो स्कुल जहां
पढना है बच्चो को -
तभी तो कविताओ को मिलेंगे लोग
और लोगो से मिलेंगी कविताए {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

खत्म नही होती शयद यात्रा भाग -२

दुसरो को क्या
स्वयम को भी पढ़ नही पाते
अपने नाम ,जाती ,धर्म के आलावा
एक औरत या पुरूष के अतिरिक्त
भी तो कुछ होता होगा
एक व्यक्ति ....?
मनुष्य का सच
मन की गहराई मे कछुवे की तरह छिपा रह जाता है
जलते दीपकों के बीच
अगरबत्ती सी सुलगती रह जाती है
इंसान की पवित्रता
शरीर खरगोश की तरह
दौड़ता हूवा पता नही
कहाँ
अदृश्य हो जाता है
और
शरीरी की कभी कछुवे की तरह
ख़त्म नही होती शायद यात्रा .{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

९९-खत्म नही होती शायद यात्रा

कहानी मे
बच्चा सुनते -सुनते
ख़ुद बन जाता है खरगोश या कछुवा
लेकिन
सचमुच मे
जीवन की भाग -दौड़
खरगोश की तरह है -
तेज बहुत तेज
रफ्तार है जीवन की
जो बिछड़ जाते है
उन्हें
याद नही कर पाते
जो मिलते है उनसे भी
परिचय -नम मात्र के लिए हो पाता है
किसी किताब के सारे पृष्ठों की तरह हम

९८-पारदर्शी कांच सा हो जाऊ तल्लीन

मै दर्पण सा
भीतर
सबका लिए प्रतिबिम्ब
सोचता जान गया
गहराई से हर झील /
अपनी दुनिया -अपना घर
सुख -दुःख से भरा
सबका अपना -अपना दिल /
कैसे निहारु अपना चेहरा
ठहरता नही आईने सा
मेरे सामने कोई आकर मिल /
अर्थ नही तो सब व्यर्थ है
रिश्ते -नातो की
पहचान मे
धन रहता क्यो शामिल /
तो क्या यही सत्य है
की मै
अपने ही बिम्ब और प्रतिबिम्ब के लिए
पारदर्शी कांच सा हो जाऊ तल्लीन । {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

apni

९७-कविता -अंश

वो भी दिन था
आज यही सोचती हू
उस रात मै सो गयी थी
पर सपनों से नाता तोड़ गयी थी
फ़िर बचपन को अधूरा ही
घर -आंगन मे छोड़ गयी थी
जैसे पर कटे पंछी सा
प्रथा द्वारा पिंजरे को सौप गयी थी
उमंगो से भरी मै थी एक कन्या
बचपन के सगाई के हाथो
क्या नही हुवी थी
मेरे अंकुरित -अरमानो की ....भ्रूण -हत्या .{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

शुक्रवार, 13 मार्च 2009

मै तो जैसे हू ही नही .

पहाड़ दिखे
मोड़ पर वृक्ष मिले
बहुत पीछे छुट गया था एक पुल
धूल से सने जूते बहरे तो थे ही
रस्ते ने कुछ कहा होगा -
मैंने भी नही सुना
अरे यह धरती भी तो एक गोल घुमावदार रास्ता ही है
मेरी तरह नदिया भी खुश होती होंगी
पहाड़ से समुद्र तक ......फ़िर समुद्र से शहर गाँवो तक की इस यात्रा से
कितना विशाल है यह आकाश .......?
और यह यात्रा मेरीया नदी की नही है .....धरती माता की यात्रा है .{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

पास और पास

पास और पास
पता नही पास -पास कितने और पास
कपड़ो के बाद -देह के भीतर तक
या
बिना कपड़ो के -या फ़िर बिना देह के
किसी के बहुत पास
बहुत पास
पहुचना चाहता है हर कोई -लेकिन ...?
पहले अपनी कमीज की तरह
अपनी देह को .....किनारे पर -उतारना होगा
फ़िर नदी से पूछना होगा .....
अब बताओ --कहा पर हो तुम --?
रेत मे या जल मे ,
शिखर पर या समुद्र मे ........?
या धुप से भरी हुवी ..... कर रही हो ....बरसात का इंतजार .{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

लो पानी पियो ,दो रोटी खा -लो

वह चुप है

यात्रा मे उसने पेड़ देखे

जंगल के बिच से होकर गया

नदी को उसने तैर -कर पार किया

पहाड़ पर चढ़ -कर सीडियो को देखता रहा

भीड़ मे असंख्य लोगो के बीच जैसे तन्हा रहा

इस यात्रा मे सब कुछ चुपचाप होता रहा -शब्दों की गूंज का अर्थ -था ही नही कुछ

भूख ,प्यास ,एकांत के दर्द -काँटों की तरह चुभते रहे बस

बहुत -बहुत पास रहते हुवे भी किसी ने --यह नही कहा -था .....

लो पानी पियो ,दो रोटी खा लो

आओ मुझसे दो बाते कर लो ...{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

हर जन्म मे

>किसी न पढ़ी गयी किताब की तरह उसे खोजता हूँ पुस्तकालय या बाज़ार में या फिर पीपल की छान्व से पूछता हूँ वो- यहा आयी थी क्या कभी ...? कभी लगता है अभी -अभी -इसी ट्रेन में बैठ कर चली गयी ..वह हर बार ,हर समय ,हर जन्म में मुझे लगाता है -कुछ छूट रहा है मुझसे जैसे ....मेरे पहुँचने से ठीक पहले -कोई ले गया हो वह पेंटिंग जिसे -मै खरीदना चाहता हूँ खाली गिलास की तरह मैं प्यासा ही रह जाता हूँ वह पानी की तरह बहती हुवी मेरी पहुँच से -बहुत दूर निकल जाती है क्या मैं सिर्फ़ इंतज़ार करता हुवा तट हूँ ...और .... वह एक लौट कर -न आने वाली लहर यदि तुम ....मेरी आत्मा हो ..तो ..सच बतोओ ... कितनी बाहर हो और कितनी मेरे भीतर मैं तुम्हें इन उन्गलियो से छूना चाहता हूँ ..... या तुम ही पहचान लो मुझे .....मेरा कौन सा नाम ,रंग ,चेहरा पसंद है तुम्हें ? रूप बदलते ....बदलते .....थक चुका हूँ मैं .{किशोर कुमार खोरेंद्र }

प्रतिक्रियाये १३-०३-09

१------๑ Ma Nirav:
कैसे अपनी कविता, प्रिय,,, पेड़, जंगल, के, बोल, सुंदर हाँ, अगर प्रेम के साथ किया, हमारे डर से एक बड़ा काम है, लेकिन है, सुंदर परिणाम देता है. अपने दिल में प्यार! अपनी कविताओं से प्यार कर रहे हैं मुझे भेज जारी रखें. आशीर्वाद! २---------kapil:
wah mai poem hi chahata tha ३------------------Ashish - into:
hey thats raelly awesome...I didn't kno that.nice poem nice 2 hav a friend like u....kp pasting the poems now and then for me. ४--------

मेरा कसूर .......वृक्ष से ....पर प्रतिक्रियाये

१-Pralhad:
अच्छी कविता है. दिल को सहसा छू गई. .....२----Gaurav vashist:
टूटे हुवे आईने में बिखरे हुवे अनंत चेहरे जिन्हें चाह कर भी छूना मना है बहुत खूब सर ३-Gaurav vashist:
kamaal hai sirbahut badhiya -----४--------*** Vibha:
bahut badhiyathanks ५- Mangala:
wah! bahotahi badhiya kavita hai! usme bahot sara artha samaya hai! ped aur Nadi dono mere ache dost hai! meri unse kya batchit hui vo mai aapako bataungi!

वृक्ष से क्या कहु पर प्रतिक्रियाये १३-०३-09

१-REENA:
बहुत खूब आप ने सही कहा उन्हें भी परछाई से बाहर आना हैलेकिन डर है कहीं काँच टूट -कर कहने लगे फिर ...... २-Manas Khatri:
bahut hi accha, maine jo kavita likhi hai,aap tak jaldi pahuchau ga-abhi type ho rahi hai..३--- ĥ@ŕē Ķŕŝńâ:
hare krishna.sir aapki kavita bahut acchi hai .--४--------कवि धीरेन्द्र:
atisundar rachna wah ji wah .५------Kumar Vinod: बहुत खूब किशोर जी ६- Pralhad:
भाईसाहब आप की कोशिश काबिल ए तारीफ़ है. आप के नज़र भारतीय महिलाओं का क्या स्थान है देश विकास और अन्य सामाजिक मुद्दों पर? इस पर चर्चा करेंगे? -

अमृत मे घुल जावो

मेरी जेब में पर्स कि जगह झील है ,तालाब है . और मेरी नस-नस में समुद्र ! नमक कि तरह भरा हुवा है मैं कहता हूँ तुमसे - हा मैं पानी हूँ --तुम भी मुझे भर लो --ख़ुद में ....एक काँच के गिलास कि तरह .चिलचिलाती धूप में सड़कों पर बहती हुवी तृष्णा कि नदी न्ही हूँ मैं मैं प्रेम कि तरह तरल हूँ .........तुम भी आ जाओ .....इस पृथ्वी के अमृत में घुल जाओ /{किशोर कुमार खोरेंद्र

गुरुवार, 12 मार्च 2009

मुझे तो आदत है ...

वृक्ष से कया कहूँ वह कहता ही नही और नदी है की सुनती नही मैं लौट कर फिर pgdndiyo से होता हुवा तुम्हारे पास आता हूँ जहा न जंगल है न नदिया केवल रुके हुवे पत्थरों कि तरह ठहरें हुवे शब्द है या टूटे हुवे आईने में बिखरे हुवे अनंत चेहरे जिन्हें चाह कर भी छूना मना है शीशे में कैद इन तमाम चेहरों के पास प्रश्न है केवल ......... उन्हें भी परछाई से बाहर आना है लेकिन डर है कहीं काँच टूट -कर कहने लगे फिर ...... मुझे तो आदात है ...चेहरो को कैद करने की .....{kishor kumar khorendra }

बुधवार, 11 मार्च 2009

होली पर ......कविता पर प्रतिक्रियाये

Girish:
बच्चो के मन , पलाश से खिले -खिले...........सुंदर गुरु कवि हकीम ..:
शुक्रीया दोस्त और होली आपको और आपके परिवार कों भी बहुत बहुत मुबारक...

प्रतिक्रियाये

होली पर ...रंगो से चेहरे पुतेअपना कौन ,पहचाने किसेकिस पर , सोचता मन मर मिटेहर व्यक्ति बिछा -बिछा सा -लगाना चाहता गले , भूल कर शिकवे गिलेआदमी के भीतर ,शहर ,अपना लग रहा हैभुला कर आज हादसों के सिलसिलेबच्चो के मन , पलाश से खिले -खिलेस्नेह की बौछार होती रहे सदैव ...एकता का रंग लिए -लिए{किशोर कुमार खोरेन्द्र } .....мєєиα:
shukriya .. apke kavithayein toh ati sundar hai g :)apko bhi holi mubarak :).......Guman Bhushan:
आपकी कविता वाकई में बहुत अच्छी लगी . जिस तरह के होली के माहोल का aapne वर्णन किया है वोह १ आदर्श माहोल है.....इस तरह ke माहोल का एहसास अगर हर किसी हो जाए, तो दुनिया स्वर्ग सी नज़र आये.. .................Mangala:
सुप्रभात! बहोत खूब लिखा है होलीके रंग देखे ,अब पहचाने खुदका अंतरंग ! उसके है गहरे रंग ,वो न बदलते है ,उत्पत्ति, स्थिति और लयके संग! ये तो खेल है मायाका,न गुम हो जाना उसके संग!...शुभदिन!

मंगलवार, 10 मार्च 2009

विचार ...

१-एक ही विराट सत्ता है ...उसके हम अविभाज्य अंग है .२-चेतना बिन्दु मनुष्य ही है ...मनुष्य दर्पण ही तो है ३-मनुष्य प्रभु की भाषा है .४-काव्य एक गम्भीर सर्जनात्मक कर्म और सत्ता है जो समग्र उत्सर्गता चाहता है .५-सारी चरा-चरता एक महान काव्य है .५-कवी के पहले काव्य नही ,काव्य के उपादान थे .६-स्रष्टि रचना है ,और रचना काव्य होती है ,हम भी काव्य है ,क्योकि रचित है ७-सर्वथा जड़ कुछ भी नही है .८-मनुष्य कवी और काव्य दोनों है ,जबकि शेष ....केवल काव्य है .९-सृष्टि का अर्थ ही है -चेतना का प्रसार -अचेतन यहा कुछ भी नही है .{श्री नरेश मेहता }संकलन कर्ता -किशोर कुमार खोरेन्द्र ..

नदी में जल बह रहा

नदी में जल बह रहा भीड़ में जैसे मै चल रहा
तट को जैसे ज्ञात नही घर को मेरी याद नही
प्रवाह सा अकुलाया कमीज के भीतर सकुचाया
नाम पूछता कोई नही राह धुन्ड़ता मुझे नही
फ़िर भी मै चलता हू चेहरों को सबके पढ़ता हू
कोई दुख -मय उससे पुछू कैसे क्यो घबराए से किस बात का भय
लगता तो ऐसा ही है तारो से तारो की पहचान नही है धुप दान कर दिया सूरज का बस् प्यार यही है छाह ओढाया पास बिठाया वृच्छो का इतना ही काम सही है
खम्बे से टिक जाऊ या चबूतरे पर बैठ जाऊ समीप आई चिडिया से मगर क्या कह पाऊ
चाहता मन तिनके सा चोंच में उसके फस जाऊ
ढुलकती जा रही पृथ्वी में और मुझमे फर्क कहा है
उसकी मेरी यात्रा का क्या अर्थ रहा है पूछता पत्थर से तू क्यो इतना पूजा जाता है सामने आदमी पड़ा उसे रौदा जाता है नदी में जल बह रहा भीड़ में वैसे मै चल रहा {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

मेरा कसूर यही है ...

मेरा कसूर यही है
मै नदी सा बहता हूवा सागर से जा मिला हू
मै रंग -रूप में फूलो सा खिला हू
मेरा धर्म ,ईमान से ,...जंगल से ज्यादा घना है
इसलिए मेरा चेहरा आज भी लापता है
मेरा पता ,पत्तो को ,पता है
मेरा गाँव वृच्छ की जडो के पास बसा है
मेरा नाम पूछ लो रेत से जो अभी अभी ...लहरों के हाथो हटा है
किसी को भी मेरे होने का भरोसा नही है
आज ही तो पुरा शहर जला है ......केवल राख बचा है
अख़बार में मेरा घर कुछ लपटों सा छपा है
मुझे बचाकर मगर ..अपने पास धुवो ने रखा है ....{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

होली पर ...

रंगो से चेहरे पुते
अपना कौन ,पहचाने किसे
किस पर , सोचता मन मर मिटे
हर व्यक्ति बिछा -बिछा सा -
लगाना चाहता गले , भूल कर शिकवे गिले
आदमी के भीतर ,शहर ,अपना लग रहा है
भुला कर आज हादसों के सिलसिले
बच्चो के मन , पलाश से खिले -खिले
स्नेह की बौछार होती रहे सदैव ...एकता का रंग लिए -लिए
{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

तुम सीधी साधी पगदंडी हो ...

१-तुम सीधी -साधी पगदंडी हो
पहाड़ की सबसे ऊँची चोटी पर
पहुचकर देखना चाहती हो
स्वयम को -
हर मोड़ से मुड़ते हुवे
समुद्र की लहरों को
पेडो से गिरे नारियल को लेकर भागते हुवे
२-तुम-
संकरे पुल पर छा गये वृच्छो की टहनियों के बिच एक घोसले में बैठी ,बंद आखो वाली नन्ही चिडिया की तरह - प्यार से भरे दानो को चुगना चाहती हो चुपचाप
देखना चाहती हो
कान बंद कर सरपट उतरती हुवी रेल पटरियों को उन पुरुषों को जो उपर बर्थ पर लेटे हुवे पढ़ते है हर स्टेसन की समुद्र तल से उचाई मगर ,अनभिग्यरह जाते है जानने से निचे बैठी हुवी पत्नी के मन की गहराई ३-तुम - उदगम से ही नदी के साथ फ़िर से बहना चाहती ही जैसे कोई स्त्री , अलमारी में कपडो की जगह , अपनी काया को छोड़कर पुरुषों की भीड़ के शहर को लाँघ जाए एकदम से ,स्वतंत्र औरप्रकाश पुंज सी उड़ती जाए वासना रहित पवित्र ४-तुम सीधी साधी पगदंडी हो पहाड़ की सबसे ऊँची चोटी पर पहुच कर यही देखना चाहती हो , न .... {किशोर कुमार खोरेन्द्र }

प्रतिक्रियाये

DURG SINGH:

Respected Kishor Ji sir,
Lots of Holi Greetings. May your poem writing instinct prosper furth

कवि धीरेन्द्र:

आपके शुभ आशीर्वाद एवं सहयोग के लिए सादर धन्यवाद | हर व्यक्ति बिछा -बिछा सा ...लगाना चाहता गले ...भूलकर शिकवे गिले ...आदमी के भीतर शहर अपना लग रहा ...भुलाकर आज हादसों के सिलसिले .{किशोर कुमार}

प्रतिक्रियाये

Gopal wishes:

आदमी के भीतर शहर अपना लग रहा
भुलाकर हादसों के सिलसिले ..........
-----वाह !दिल को छू गयी ........................

Mangala:

wah! bahot khub! Holiki Shubhakamanaye!..have a nice day!

Jenny:

बहुत अच्छा कहा आपने सर, होली में ऐसा होना लाजिमी है. होली मुबारक हो......................

प्रतिक्रियाये

१-----

Tarot Reader n:

you are so good with words.......................२----------


deepak:

woh woh sir ..........kya bat hai ....aap to book chapavani chahi ye .........aap bahut aacha likhate hai. me to aap ka fen ho gaya sir ...........aap ke liye ak website bana na chahta hu ... .........usme aap aapani kavita likhiye ga. or bhi aap ke kavi dosto ko add kayaye ga ..------

रविवार, 8 मार्च 2009

प्रतिक्रियाये ०८/०३/09

१---शुरुवात कही से तो करना ही है ....पर प्रतिक्रिया ........Jenny:
किशोर जी,आपकी कवितायेँ बहुत खुबसूरत होती, चाहे विषय जो भी हो. धन्यवाद् मुझसे बांटने केलिए. .............२---औरत ..पर प्रतिक्रिया .........................mona:
jai shri krishn sai.......acchi kavitha hai kishore ji.......womens day ke liye aap ki taraf ye mereliye bohoth hi behatar toufa hai.......thank u very much .......३............Jayajyoti:
bah, bahut achhe Kishor ji...aap ki kabitao ke tarif me kya bolu...ek se badkar ek achhe hai sab... ४-...........arun:
सर धन्यवाद् तो मुझे आपको देना चाहिए... जो आपने मुझसे दोस्ती की.... वैसे आपकी मैंने प्रेम किया है... रचना अच्छी है.. में उसे अपने दोस्तों को भेज रहा हु.... ........

शनिवार, 7 मार्च 2009

शुरुवात कही से भी हो ...

...{. भाग १.}....१-मैंने प्रेम किया है .....डायरी के हर पन्ने में उसका नाम लिखा है .....खाली सीट पर वह बैठी है ,यह सोच कर -हर बस् ,हर ट्रेन ...में सफर करता रहा हू ......राह में उसके ,..उगने -वाली कठिना-इयो को जड़ सहित काटता रहा हू ......उसके स्पर्श को ..रुमाल में बांधकर रखता रहा हू .......--जब भी ट्रेन गुजरी ......पटरियों पर ... उसके जुड़े से गिरा एक मोंगरा दुन्ड़ता रहा हू ....../...2.........हां मैंने प्रेम किया है ...वो किताब अब भी मेरे पास है ...जिसकी कहानियों मे........उसके लिए .... मै ....नायक हूवा करता था .............एक पन्ने का कोना तुमने मोड़ दिया है ....मुझे लगता है ....आज भी उसके भीतर मुझे ..घूरती .......तुम्हारी दोनों आँखे बंद है ............वो कलम भी है मेरे पास जिसमे स्याही ........उसने अपने हाथो से भरी थी ...........{..शेष आगे }... .....--{भाग २}-----३-अब अक्सर .....पहाड़ पर एक चट्टान के पास जाकर ....लिखा हूवा मेरे बाजु में उसका नाम पढ़ लिया करता हू ...........अब अक्सर .....पेड़ की उस डाल पर जोअब बहुत ऊंचाई पर है .उसकी ..लिखी मिटती सी कवीता को रट लिया करता हू ........अब अक्सर जब भी वक्त मिलता है ....उसके शहर को अपनी गलियो की तरह घूम आया करता हू .........४---उस बहाने पत्थरों की जगह ...किसी इन्सान की ...पूजा कर लिया करता हू ...............५शुरुवात कही से भी हो .....प्रेम करना तो सीख ही गया हूँ .....हां मैंने भी प्रेम किया है ......{kishor कुमार खोरेन्द्र }

शुरुवात कही से भी हो

...{. भाग १.}....१-मैंने प्रेम किया है .....डायरी के हर पन्ने में उसका नाम लिखा है .....खाली सीट पर वह बैठी है ,यह सोच कर -हर बस् ,हर ट्रेन ...में सफर करता रहा हू ......राह में उसके ,..उगने -वाली कठिना-इयो को जड़ सहित काटता रहा हू ......उसके स्पर्श को ..रुमाल में बांधकर रखता रहा हू .......--जब भी ट्रेन गुजरी ......पटरियों पर ... उसके जुड़े से गिरा एक मोंगरा दुन्ड़ता रहा हू ....../...2.........हां मैंने प्रेम किया है ...वो किताब अब भी मेरे पास है ...जिसकी कहानियों मे........उसके लिए .... मै ....नायक हूवा करता था .............एक पन्ने का कोना तुमने मोड़ दिया है ....मुझे लगता है ....आज भी उसके भीतर मुझे ..घूरती .......तुम्हारी दोनों आँखे बंद है ............वो कलम भी है मेरे पास जिसमे स्याही ........उसने अपने हाथो से भरी थी ...........{..शेष आगे }... .....--{भाग २}-----३-अब अक्सर .....पहाड़ पर एक चट्टान के पास जाकर ....लिखा हूवा मेरे बाजु में उसका नाम पढ़ लिया करता हू ...........अब अक्सर .....पेड़ की उस डाल पर जोअब बहुत ऊंचाई पर है .उसकी ..लिखी मिटती सी कवीता को रट लिया करता हू ........अब अक्सर जब भी वक्त मिलता है ....उसके शहर को अपनी गलियो की तरह घूम आया करता हू .........४---उस बहाने पत्थरों की जगह ...किसी इन्सान की ...पूजा कर लिया करता हू ...............५शुरुवात कही से भी हो .....प्रेम करना तो सीख ही गया हूँ .....हां मैंने भी प्रेम किया है ......{kishor कुमार खोरेन्द्र }

मेरा परिचय ....

मेरा नाम-kishor कुमार खोरेन्द्र है .मै नवागांव { मुंगेली ,बिलासपुर छत्तीसगढ़ },का निवासी हू .मै स्टेट बैंक से रिटायर हूवा अधिकारी हू .मेरी उम्र ५५ वर्ष है .मै ईश्वर और सत्य से प्रेम करता हू .मुझे कविता-लिखने ,पढ़ने ,और सूनने,..का शौक है .मै सकारात्मक सोच को जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानता हू .आपने मुझे अपने मित्रो की सूचि में शामिल किया ..धन्यवाद .यदि आप रचनाकार है तो आपकी रचनाओ का स्वागत है ..मित्र .......मेरे नेट पर उपस्थित होने का समय "संध्या ७से१० तक" ही है . स्क्रैप के द्वारा नियमित सम्पर्क बनाये -रखियेगा .मै बाबा शिवानन्द ,श्री अरविन्द ,स्वामी विवेकानन्द .श्री श्री रविशंकर ......इन्हे पसंद करता हू .

प्रतिक्रिया ...०७ /०३ /०९

deepak:
vah .........bahut badiya..... aap ke soch me ............///{....अमर होली ..." १-बंदूक हू या चली गोली या फ़िर सडक पर गूंजती आतंकित सहमी बोली /२-नेताओ का भाषण या प्रतिक्रियाओ की सुरत भोली /३-या देश हित में खायी -कसमो की प्रज्वलित "अमर होली "/४-मै कौन हूँ ........?/५-मै जन -मानस की चिंता या गोलियों को झेलता सीना /६-विस्फोट से छिटका दूर पड़ा -क्या अनाम आदमी की देह का हू एक चिथडा /......{kishor कुमार खोरेन्द्र }}..////............ bahut gaharai hai sir ................ .

शुक्रवार, 6 मार्च 2009

प्रतिक्रियाये ....औरत ,अमर होली ,अनंत से अनंत तक ,आतंकित आदमीकविताओ पर

१----VINOD BISSA:
" धुप की तरह आदमी भी ...मेरी पकड़ से बाहर है ....." क्या शानदार बात कही है आपने वाह ....बहुत खूब --------२---VINOD BISSA:
बहुत शानदार किशोर जी .... ....३------Girish:
आशीर्वाद के लिए झुके हुवे ....उसे ..सदियों बीत गये ......is good. .........४------мєєиα:
Jai Gurudev Kishorji accha laga aapka scrap padkar .. acchi baat hai .. hum phir milenge ...........५...........गार्गी..thanks aapko kee aap ne itni sundar liens send kee.bahut hee bahut pyari hain, dil ko chu lene waliaapki toh books nikalti hongi!!! .......६--------bhavana:
wow a v v v beautiful one dear, thanks a lot for it .......

law of attraction {पार्ट-बी}

-----12-KYA KARE ...KYA KYA KRE ..... ----१३--Exactly we are thinking about past, or future Always. Therefore we are actually thoughts only. If we know, how to choose correct thoughts for us, then we reach our goal same moment. ----१४--Our current thoughts are creating our future life Therefore we must thing about the things, which related goal. ............१५---16-How do you draw from it ? You do it through your awareness of it and by using your wonderful imagination. Look around you for needs waiting to be filled. Imagine if we had a great invention or Imagine if we had a great invention to that. Look for the needs, and then Imagine and think their fulfilments into being .you do not have to work out the discovery or the invention .The supreme mind holds that possibility. All you have to do is hold you mind the end result and imaging filling the need, and you will call it into being. As you ask and feel and believe you will receive. There is an unlimited supply of ideas waiting for you to tap into and bring for. You hold every thing in your consciousness. ............१६---17-There are three steps for me to create, what I want.First is to ask, make a command to the Universe.Second is believed. Believe that it is already mine. Third is to receive. Begin to feel wonderful about it. Feel it know {kishor कुमार खोरेन्द्र .....यह २ भाग में है ..a..और बी}

law of attraction ...

1-dear friend ,..If you think and believe you are able to succeed,the brain also attempts to comply.All of our feelings ,beliefs ,and beliefs,and knowledge are based on our internal thoughts, both conscious and subconscious . 2-......We are in control,whether we know it or not .We can be positive or negative ,active or passive .Our present attitudes are habits ,built from the feedback of parents ,friends,society and self,that form our self image and our world image.3-....THESE ATTITUDES ARE MAINTAINED BY THE INNER CONVERSATIONS WE CONSTANTLY HAVE WITH OURSELVES,BOTH CONSCIOUSLY AND SUBCONSCIOUSLY. . .......4-The 1st step in changing our attitudes is to change our inner conversations .A.....make a positive commitment to yourself ...b........set goals and priorities for what you think an6.think of this for a moment, look at your hand.It looks solid but it is really not .if you put it under a proper microscope, you see a mask of energy vibrating d do {, c......be courageous.change and improve each day .. }7-Everything is made up of the exact same thing, whether it is your hand, the ocean, or a star . .........8-Everything is energy, and let me help you to understand that just a little bit. There is the Universe, our galaxy, our planet and then individuals, and then inside of this body are organ system, then cells, then molecules and then atoms, and then there is energy. So there are a lot of levels to thing about, but everything in the Universe is energy. १०------When you think about what you want, and you emit the frequency, you cause the energy of what you want to vibrate at the frequency and you bring it you, As you focus on what you want, you are changing the vibration of the atoms of the thing and you are causing it to vibrate to you. The reason you are the most powerful transmission tower in the Universe is because you have been given the power to focus your energy through your thoughts and alter the vibration are focused on, which then magnetically draws it to you -11--.energy vibrates at a frequency. Being energy, you also vibrate at a frequency, and what determines your frequency At any time is whatever you are thinking and feeling. All the things you want are made of energy, and they are vibrating too. Everything Is energy? ................................

गुरुवार, 5 मार्च 2009

अध्यात्मिक मित्र

१-किस ग्रह से तुम ...पृथ्वी पर आई ......मै भी जन्मो से ..यात्री सा ढूंढ़ रहा .....अन्तरिक्ष में जसे साथी तुमसा कोई ...२-रूप रंग सुंदर ..आकार तुम्हारा .....क्या अमृत सा मीठा हो पायेगा ...मित्रवत ....प्यार हमारा ..३-यह केवल देह का आकर्षण नही है ....मधुर -मिलन से भी ऊँचा है आकाश हमारा .....३-दिल में जो लहरों का आमन्त्रण होता है .....वः देह -सरोवर की हलचल से ज्यादा ....विस्तृत और पावन होता है ...४- जैसे सिप में मोती सा ...वः हरदम छिपा..........५-...वः रहता ..".अचेतन मन की अतल गहराई में ....एक बूंद जल के भीतर हो जैसे किसी महानदी की बाढ़ सी अंगडाई में "{kishor कुमार }

अध्यात्मिक मित्र ....

-किस ग्रह से तुम इस पृथ्वी पर आई ..मई भी जन्म यात्री सा ढूंढ़ रहा .....अन्तरिक्ष में जैसे साथी इक सितारा तुमसा कोई ...-रूप रंग सुंदर ,आकर तुम्हारा ...काया अमृत सा मीठा हो पायेगा ..?.......मित्रवत यह प्यार हमारा .....-यह केवल देह का आकर्षण नही है ....मदुर -मिलन से भी ऊँचा है आकाश हमारा ....-दिल में जो लहरों का आमन्त्रण होता है ...वः देह -सरोवर की हलचल से ज्यादा ....विस्तृत और पावन होता है ....-अचेतन मन की गहराई मेन ....सिप में मोती सा छिपा ...jaजल
औरत १...वः न दर्पण में समाई कोई मूर्ति ......कोख से उसे ...उतरने दो ..धरा की है वो खूबसूरती ../२-...दफ्तर में उसे टेबल न समझो ....घर में न है वो बेजान कुर्सी ......उम्र के हर मोड़ पर आ मिलती है ....ममताके जल से भरी हुवी जैसे हो वः एक बहती नदी /३-...स्पर्श से उसके ..पत्तियों में हरे रंग उभरते है ...उसके रूप ..तुलसी के आगे दिए से जलते है ..सिचने से जिसके पानी ..बेजान पौधे जी उठते है .....वो माँ है ..स्नेह के आंच से गर्म एक शाल ../४-मन जिसका मायका ...देह ससुराल .......भाई को देखे बिना ..बहना सी बेहाल ....वो औरत है मित्र जिसके तुम हो सवाल ...//{kishor kumar खोरेन्द्र } ...................१-Er.sAnJaY: VINOD BISSA: २--------
वाह किशोर जी ..... बहुत ही शानदार अभिव्यक्ति है ..३-... Guman Bhushan:
good reasoning........परिपक्व विचार हैं...
hiiiiiiiiiiiiiii kishoreji.h ru?aap ne sab sahi likha hai........४--deepak:
किशोर जी आप तो बहुत आछी कविता लिखते है ...thank u sir .....om nmh shivaya ....-

प्रतिक्रिया

पिकनिक में
तुम्हारी देह से भींग गया जल ..........तुम्हारी हंसी में गूंज रही हो नदी की कल -कल ...........अपनी पीठ पर बिठा कर तुम्हे ,हिल गया ,कुछ ,पथरीला मन ..........फूल पूछ रहे हो आपस में ,किसका है यह हमसे सुंदर तन .........मित्र खुशिया ,मुस्कुराहटो की तरह -धुप सी फ़ैल ही जाती है .........और झूम उठते है ,-"प्रेम के अंकुरित बिज -कण"[kishor कुमार खोरेन्द्र } .............१-๑ Ma Nirav:
Dear friend, my gartidão the poem, I was very happy and honored. Kisses on your sweet heart. Blessings of Osho in his life! Love Nirav Suvira

प्रतिक्रियाये

अमर होली ... १-बंदूक हू या चली गोली या फ़िर सडक पर गूंजती आतंकित सहमी बोली /२-नेताओ का भाषण या प्रतिक्रियाओ की सुरत भोली /३-या देश हित में खायी -कसमो की प्रज्वलित "अमर होली "/४-मै कौन हूँ ........?/५-मै जन -मानस की चिंता या गोलियों को झेलता सीना /६-विस्फोट से छिटका दूर पड़ा -अनाम आदमी की देह का हू एक टुकडा /......{kishor कुमार खोरेन्द्र } ...............१-...अमन:
BAHUT BADIYA ..........२-rajesh bissa:
एक गम्भीर रचना है ...... किशोर भाई .... बहुत अच्छे .... ...३-VINOD BISSA:
वाह ..... बहुत शानदार लिखा है आपने ..... आक्रोश एक एक शब्द में झलकता है ....... किशोर जी शुभकामनाएं ...........४-arun:
sahi baat hai bahut acha hai

विचार

जो सबसे निकटम व्यक्ति ,या .वस्तु ..होते है ..जैसे स्वयम व्यक्ति .उसकी देह ,..माता-pita , भाई -बहन ,आदरणीय गुरु यहाँ तक की अपनी आत्मा ....या ईश्वर..फ़ीर अपना खुद का घर ही क्यों न हो ..व्यक्ति इन्हें नजर अंदाज कर ..दूर के व्यक्तियों और वस्तुओ मे ज्यादा आकर्षण महसूस करता है ....आपनी पत्नी से ज्यादा सुंदर , दूसरे की पत्नी ..लगती है ...यह मनो -विज्ञानं ..है तो गलत ..परन्तु प्रचलन मे यही है ...लेकीन ..बुद्धिमान मनुष्य ....को अपनी आत्मा ..अपने माता -pita ,..अपने गुरु .......और अपनी धर्म -पत्नी तथा अपने सभी मित्रो मे रब ..दीखता है --व्यक्ति स्वयम ही अपना MITR है at: उसकी अंतरात्मा ----के अनुसार ....पहले खुद मे खुदा होना चाहिए .{kishor कुमार }thank u

प्रतिक्रिया

Latesh,MyKrishna:
Ye sab Krishna ki Maya Hai.Ye sab sansar ka niyam hai yadi aisa na ho toh sansar chalega kaise. Ye sab Kalyug ka prakop hai. Naagin hazaron sapore ko janam deti hai aur fir unmese kai ko nigal b jati hai, jo uski perpheri se bahar nikal gaya vo sapora bach gaya jo andar hi rah jate hai unhe naagin nigal jati hai. Ye sab kya darshata hai, yahi darshata hai ki yadi nagin apne bachon ko na nigalti toh shayad yah sansar ek sanpon se bhara bhandar hota ghar ghar me saanp dikhai dete. par aisa nahi hai. Badi machli choti machli ko nigalti hai. saanp maindak ko, maindak chote chote jantuo ko aur vagair vagairh issi tarah sansar ka chakra chalta rahta hai. ye zindagi ka karva sach hai aur isse hume apnana hoga shok nahi karna hoga.Kahte hai, Dehआतंकित है आदमी .... १-धुप की तरह आदमी भी ...मेरी पकड़ से बाहर है .....२- विस्फोट से वृक्षो की तरह उखड़े हुवे लोग ..सडको पर ..पुरे शहर की तरह बह रहे है ...३-आदमी ,आदमी में ड़ूब रहा है ...रास्ता आदमी के भीतर है या नही ...आतंकित है आदमी ..आदमी से पूछ रहा है ...४-और कोई एक मनुष्य लापरवाह पृथ्वी को ...दूर धकेलता हूवा -टूट कर गिरते हुवे ..सितारों की आंच से अपनी रोटी सेंक रहा है ....५-अजीब दृश्य है ..नीव खिसक रहे है fdfdate पंखो को घायल कबूतर देख रहे है ....ये कैसा धुंवा ..कैसी बौछार है ....६-हल निकल कर आता नही ...सवाल दर सवाल ...क्या बरसों तक चलने वाली तकरार है {kishor कुमार खोरेन्द्र } k deep me pran ki jyoti ,Kaal jalaye Kaal bhujaye,Gyani vichilit hote nahi koi jag me aaye ya jag se jaye. Isliye dost yadi aadmi hi adamkhor ho gaya hai to isme koi shok nahi prakat karna hai aur na hi aisi bhavnao ko kabi kavita me lakar dukhi nahi hona hai. Aap

प्रतिक्रिया

arvind sharma हर:-पता नहीं कब उस आखरी आदमी का जन्म होगा ...जिसकी कवीता आखरी होगी और ...जीसे सुनते ही सारे लोग एक् हो जायेंगे ...लेकीन कवीता सुन रहे मेरे दोस्तों ..जान लो ..-पहली कवीता की तरह ही होगी वह आखरी कवीताबहुत सुंदर सर जी मै अब क्या लिखू सब् कुछ लिख दिया आप ने मेरे पास शब्द ही नही वाह वाह ....बस सर जी मेरा आप चरण स्पर्श करता हूँ

अमर होली ...

१-बंदूक हू या चली गोली या फ़िर सडक पर गूंजती आतंकित सहमी बोली /२-नेताओ का भाषण या प्रतिक्रियाओ की सुरत भोली /३-या देश हित में खायी -कसमो की प्रज्वलित "अमर होली "/४-मै कौन हूँ ........?/५-मै जन -मानस की चिंता या गोलियों को झेलता सीना /६-विस्फोट से छिटका दूर पड़ा -अनाम आदमी की देह का हू एक टुकडा /......{kishor कुमार खोरेन्द्र }

पिकनिक में

तुम्हारी देह से भींग गया जल ..........तुम्हारी हंसी में गूंज रही हो नदी की कल -कल ...........अपनी पीठ पर बिठा कर तुम्हे ,हिल गया ,कुछ ,पथरीला मन ..........फूल पूछ रहे हो आपस में ,किसका है यह हमसे सुंदर तन .........मित्र खुशिया ,मुस्कुराहटो की तरह -धुप सी फ़ैल ही जाती है .........और झूम उठते है ,-"प्रेम के अंकुरित बिज -कण"[kishor कुमार खोरेन्द्र }

बुधवार, 4 मार्च 2009

औरत

औरत १...वः न दर्पण में समाई कोई मूर्ति ......कोख से उसे ...उतरने दो ..धरा की है वो खूबसूरती ../२-...दफ्तर में उसे टेबल न समझो ....घर में न है वो बेजान कुर्सी ......उम्र के हर मोड़ पर आ मिलती है ....ममताके जल से भरी हुवी जैसे हो वः एक बहती नदी /३-...स्पर्श से उसके ..पत्तियों में हरे रंग उभरते है ...उसके रूप ..तुलसी के आगे दिए से जलते है ..सिचने से जिसके पानी ..बेजान पौधे जी उठते है .....वो माँ है ..स्नेह के आंच से गर्म एक शाल ../४-मन जिसका मायका ...देह ससुराल .......भाई को देखे बिना ..बहना सी बेहाल ....वो औरत है मित्र जिसके तुम हो सवाल ...//{kishor kumar खोरेन्द्र }

निष्कर्ष

मेरा प्रमुख कार्य राष्ट्र -प्रेम ,नैतिकता केसाथ ....शिक्षा का प्रसार ही है ....

आतंकित है आदमी ....

१-धुप की तरह आदमी भी ...मेरी पकड़ से बाहर है .....२- विस्फोट से वृक्षो की तरह उखड़े हुवे लोग ..सडको पर ..पुरे शहर की तरह बह रहे है ...३-आदमी ,आदमी में ड़ूब रहा है ...रास्ता आदमी के भीतर है या नही ...आतंकित है आदमी ..आदमी से पूछ रहा है ...४-और कोई एक मनुष्य लापरवाह पृथ्वी को ...दूर धकेलता हूवा -टूट कर गिरते हुवे ..सितारों की आंच से अपनी रोटी सेंक रहा है ....५-अजीब दृश्य है ..नीव खिसक रहे है fdfdate पंखो को घायल कबूतर देख रहे है ....ये कैसा धुंवा ..कैसी बौछार है ....६-हल निकल कर आता नही ...सवाल दर सवाल ...क्या बरसों तक चलने वाली तकरार है {kishor कुमार खोरेन्द्र }

किल पर

अन्नत से अन्नत तक .....इस यात्रा में ......वः भूख और रोटी के बिच ...अपने विचरो की किल पर ....भूख से झुका हूवा .....रोटी की परिक्रमा करता है ....पृथ्वी की तरह ....सघन वन में सूर्य को ...धुप की तरह छांह में बैठा देखता है ..एकांत में ..चिलचिलाता हूवा ...उसकी तनिबन्द मुठ्ठियों में ..न धुप है न ...आचमन के लिए भरा जल ही ठहर पाया है ....आरती के जलते दियो के समक्ष ........आशीर्वाद के लिए झुका हूवा सिर ....क्या hinshk tlvaro की var shne के लिए ही है {kishor kumar khorendra }

मंगलवार, 3 मार्च 2009

एक विचार ..

....व्यक्ति का उद्देश्य ..निरंतर छ्नते जाना नही है ..परन्तु क्या करे ...हमारे आनन्द मे यही एक् कार्य शेष रह जाता है .की अंतत: हम तन्हा .अकेले हो जाये ...और सत्य को ,ओस की एक् बूंद मे भी ..झाँकने लग जाये ..तात्पर्य ...आखिर छानने के बाद ,..बचे हुवे एक् शब्द ,या .बची हई एक् कवीता ,या .रह गयेव्य्क्ति के व्यापक व्यक्तित्व के आलावा हम है क्या ..?....धन्यवाद MITR {kishor कुमार खोरेन्द्र }

पूछते है मित्र

धरती पानी की एक बूंद सी ...जल में उसके हम सब घुले हुवे .....आँखों में सबके एक सा सपना है भरा /....पूछते हो मित्र मुझसे मेरा पता ....घोसले के भीतर ..चिडियों सा रहता हू सदा //{kishor कुमार खोरेन्द्र } ..

औरत

१-वः न कपडा है न जूती...वः न दर्पण में समाई कोई मूर्ति ......कोख से उसे ...उतरने दो ..धरा की है वो खूबसूरती ../२-...दफ्तर में उसे टेबल न समझो ....घर में न है वो बेजान कुर्सी ......उम्र के हर मोड़ पर आ मिलती है ....ममताके जल से भरी हुवी जैसे हो वः एक बहती नदी /३-...स्पर्श से उसके ..पत्तियों में हरे रंग उभरते है ...उसके rup ..तुलसी के आगे दिए से जलते है ..सिचने से जिसके पानी ..बेजान पौधे जी उठते है .....वो माँ है ..स्नेह के आंच से गर्म एक गोरशी../४-mn जिसका mayka ...deh ssural .......भाई को देखे बिना ..bhna si behal ....वो औरत है मित्र जिसके तुम हो sval ...जुड़े tk ही mt rkho उसे simit .....jhulti rngin ..dorsi ....//{kishor kumar khorendra }

प्रतिक्रिया ..०३-०३-09

Avdhesh S Yadav:
नहीं नहीं श्रीमान ...........आप भी बहुत अच्छा लिखते है , में तो बस यु ही .....आप सबका प्यार बना रहे यही काफी है २-........**sahzadi**:
बिलकुल आप अपनी रचना भेज सकते है,परन्तु इसके लिए आपको अनुमति कि क्या आवश्यकता है,आपकी कविता इतने मनमोहक होते है कि उसे बार-बार पढने कि चाहत होती है... ३-.....**sahzadi**:
मैंने आपकी कवितायेँ पढ़ी,अतिसुंदर....!!! ४-Avdhesh S Yadav:
बहुत ही अच्छा लिखते है आप ...५-....**sahzadi**:
सुप्रभात अंकल जी,मैं कुछ दिनों के लिए अपने ससुराल गयी थी आपकी रचनायें मैंने पढ़ी ,आपकी कवितायेँ बहुत गहरी बातें कहती ,मुझे बहुत अच्छी लगी ...६-...Jenny:
किशोर जी,बहुत सही कहा एकांत तो बहुत ही जरुरी है, खुद केलिए और आत्म-विवेचना केलिए धन्यवाद् .....७-.....योगेश:
बहुत अच्छी हैं आपकी कवितायेँ .. बधाई है मेरी ओउर से आपको..

नदी में जल बह रहा ...

१-नदी मे जल बह रहा .....भीड़ मे जैसे मै चल रहा .....तट को जैसे ज्ञात नही ...घर को मेरी याद नही ......./प्रवाह सा अकुलाया .....कमीज के भीतर सकुचाया .....नाम पूछता कोई नही ........राह दुन्ड़ता मुझे नही .../फ़ीर भी मै चलता हू....चेहरों को सबके पढ़ता हू .../कोई लगता दुःख मय पूंछू कैसे घबराए से क्यों ..किस बात का भय / २-लगता तो ऐसा ही है .....तारों से तारों की पहचान नहीं है ....धुप दान कर दिया ..सूरज का बस् प्यार यही है ...छाँह ओडाया , पास बिठाया ...वृच्छो का इतना ही काम सही है ...../खम्बे से टिक जाऊ या ...चबूतरे पर बैठ जाऊ ....समीप आई चिडिया से ...मगर क्या -क्या कह पाऊ ... चाहता मन तिनके सा ...उसके चोंच मे फंस जाऊ // ३-ढुलकती जा रही पृथ्वी और ....मुझमे क्या फर्क है ...शून्य मे उसकी और ...मेरी यात्रा का कहां अंत है /पूछता पत्थर से ..तू क्यों पूजा जाता है ...सामने आदमी बीमार पड़ा ...उसे रौंदा जाता है /कर अनदेखा ..भीड़ की बहती नदी को ..सरपट छूने चाँद ..क्यों पहुंच जाता है /....नदी मे जल बह रहा ....भीड़ मे जसे मै चल रहा {kishor कुमार }