शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

kavita

किसी कवी की कवीता पड़कर ..तृप्त होना कवीता है ,..कवीता न लिख पाऊ ,पर ..कलम लेकर बैट जाऊ ,...और कोरे पृष्ट को देखता रहू ,.यह भी एक कवीता है ...कवीता शब्दों में ,कवी में या किताबो में बंद नही है ,...कवीता तोस्म्पूर्ण आदमी के भीतर है ,..समय से उसका अनुबंध है ....आखरी कवीता का ...सबको इंतजार है ...{किशोर कुमार }

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