सोमवार, 16 फ़रवरी 2009

भूख ही सत्य है

आकाश उड़ रहा है 
चिडिया के संग .
चोच में तिनके की  तरह दबा हुआ  .है .
आईने से चुराया हुआ  एक टुकड़ा  प्रतिबिम्ब ..
डर है ..छूट  न जाये ..
चिड़ियाँ  कही गिर न जाये ..
शीशे की तरह वह टूट  न जाये .. 
 प्रतिबिम्ब में एक घोसला है ..
और घोसले में अंडो के भीतर 
साँस ले रहा है ..धरती  का सत्य .
सपनों की तरह पल भर में 
मीलों  दूरी ...तय कर रहे है पंख ...
टहनियों के पत्ते .हवा से कह रहे है ..
रुक जावो ..
.वृक्ष  हाथो को फैलाये ताक रहा है  ऊपर .....
शायद गुलेल के निशाने पर है चिडिया ... . 
अच्छा हो इस बार भी निशाना चूक  जाये ..
बच जाये चिडिया ...
और प्रतिबिम्ब का एक टुकडा भी ... 
घोसलें  में अभी -अभी जन्मी नन्ही चिडिया भी..
बंद आँखों से.. क्या ....? 
देखना चाह रही है अपना .. प्रतिबिम्ब ...
लेकीन ...खुले चोंच को दानो का इंतजार है ...
भूख ही सत्य है 

किशोर कुमार खोरेन्द्र 

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