मंगलवार, 24 फ़रवरी 2009

स्वप्न ,..यह धरती का है ...

svpn ,..yh dhrti ka hai ...
स्वप्न .यह धरती का है .. १-गोल धरती ....जैसे पानी की एक बूंद ...उसके सपनों के महासागर से उछलकर ..मछली की तरह मै ....कहां जा पाता हू बाहर ......२-लौट आता हू .....शहर से गाँव ...गाँव में अपने घर आंगन ....३-फ़िर विचारो के जलाशय में ....डूबे हुवे मन को ...ढूडने के लिए बैठा रहता हूँ ....बिछा कर एक जाल......४-स्वप्न यह धरती का है ....पर डूबा रहता हूँ मै ...कभी ..अहंकार से गले हुवे नाक सा / टपक जाता हूँ ....साकार हुवे घाव से ?पट्टियो की तरह भींग जाता हूँ ....किसी के कश् में धुंवो सा छितरा कर अदृश्य हो जाता हूँ .......गरीब -फुटपाथ के किनारे सिक्को सा उछल जाता हूँ ....५-और फ़िर चढ़ने -उतरने के दर्द को पग-dndiyo सा ...पहाडे की तरह रटता हूँ मै ....या काँटों को फूल समझ कर चलते पांवो को छालो सा -जीता हूँ मै ...६-मेरे स्वप्न में धरती ..कभी ..एक गोल हवाई झुला है ..जहाँ से कूदना मना है ....मेरे स्वप्न में धरती -कभी -बदनाम पालीथीन से बनी ..अन्तरिक्ष के शहर में भटकती ...हवा से भरी एक झिल्ली है ...जिसे छूना मना है ......७-लेकिन क्या सचमुच में मेरे स्वप्न में धरती -माटी के सत्य से निर्मित ......आकाश की थाल में प्रज्वलित ..एक दिया है ...जिसमे जलती बाती ने ...केवल प्रेम के अमृत को पिया है ॥?..?...............८-लेकिन मेरे स्वप्न भी तो ..आख़िर धरती के ही है .........८-इसलिए ,.....क्या धरती भी किसी का सपना है ............{kishor कुमार }

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