सोमवार, 16 फ़रवरी 2009

सत्य निराकार है ..भाग --७..,८..,

६-माँ के प्यार की आंच ..धुप की तरह है ..इस घोसले के हर तिनके में ..गाठो की तरह सुरक्षित है सत्य ..७-दर्पण का एक टुकडा भी तो आखिर एक सम्पूर्ण आइना ही है ..अब टुकड़े -भर आईने में ..खुद को छोड़कर ..बच्चो के लीये निशचिंत चिडिया ..खेतो से दाने लेन जायेगी ..दूर -दूर .तक ८-तब तक क्या ..प्रतिबिम्ब को ...चिडिये की तरह उड़ने से रोक पायेगा सत्य .....वैसे .भी .सत्य ..को..दर्पण की आवश्यकता नही है ..." सत्य तो निराकार है न ".....{kishor कुमार खोरेंद्र }.

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