सोमवार, 16 फ़रवरी 2009

नदी मै जल सा रह गया हू ..{५}

५-या ..ओझल होते हुवे .अपने समर्पण के दोने में जा बैठा हू ..स्वयम से बिदा लेता हुआ ..मन्त्र -मुग्द प्रवाह के संग /...माफ़ करना दोस्तों ..मै अब बह गया हू ..नदी में जल सा रह गया हू ..मै सचमुच ...पहाड़ और समुद्र के बीच ...एक अंतहीन पगदंडी सा ..इस पृथ्वी के संग ..चल गया हू ..{किशोर कुमार खोरेंद्र } }

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