गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009

सच ..!कैसे भी जन लू ...

१-पृथ्वी को बाल्टी की तरह उलट दू ........सागर के भीतर छिपा कोई तो होगा ..?..भाग न पाए ...उसे पकढ़ लू ............यही चाहता है मन ......सच कैसे भी जान लू / २-सदियों लग जाए .......इस तारे से उसतारे .......बिन हारे मै जाऊ ........ब्रम्हांड में रहता कही तो वह होगा ?चरण छू लू उसके ....यही चाहता है मन ....सच कैसे भी जान लू //..३-साकार नही वो क्या निराकार है ....कैसे मानू मेरा मालिक किस प्रकार है ...संसार अगर बहुत विशाल है ..?..लगता शीशा उसका फोड़ दू ....परछाइयो की भीड़ में छिपे उन्हें फ़िर ....एक टुकड़े दर्पण सा खोज लू ....यही चाहता है मन ...सच कैसे भी जन लू ///..४-पर मित्र मेरे तुम कहते हो सत्य जानना अति सरल ..........बैठ जाओ एकांत में ....मौन हो मगन .....ज्ञान मिलेगा जैसे ध्यान से ..बीज में होता है अंकुरण ...मित्र मेरे तुम्हे नमन ..तुम्हे नमन ...////......समाप्त

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