शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2009

प्रतिक्रिया..२७-०२-09

......७-लेकिन क्या सचमुच में मेरे स्वप्न में धरती -माटी के सत्य से निर्मित ......आकाश की थाल में प्रज्वलित ..एक दिया है ...जिसमे जलती बा ती ने ...केवल प्रेम के अमृत को पिया है .................८लेकिन मेरे स्वप्न भी तो ..आख़िर धरती के ही है .........८-इसलिए ,.....क्या धरती भी किसी का सपना है ...?.........{kishor कुमार } VINOD BISSA:
achchhi rachanaa hai ..............७-लेकिन क्या सचमुच में मेरे स्वप्न में धरती -माटी के सत्य से निर्मित ......आकाश की थाल में प्रज्वलित ..एक दिया है ...जिसमे जलती बाती ने ...केवल प्रेम के अमृत को पिया है ॥?..?...............८-लेकिन मेरे स्वप्न भी तो ..आख़िर धरती के ही है .........८-इसलिए ,.....क्या धरती भी किसी का सपना है ............{kishor कुमार } ....Latesh,MyKrishna:
nice poem. Yadi yah dharti na hoti toh shayad panch tatva na hote aur fir hum manushya b na hote. Issi dharti hi saare sansar ka bhoj uthakar b vahi ki vahi tikki hai aur hume dharya bharane ki shiksha deti hai. .............गूंजा मौन गूंजा मौन यहाँ ....एकांत कलरव सी आहट है ..इस नीड़ की अमराई मे ..हर तिनको का svagt है ..खोजता चिडिया को .. उड़ती हुवी ..जैसे .. एक् पंख हो ..धुप सी यहाँ ठहर जाओ ..एक् टुकड़े आकाश सा उतर आओ ......{kishor कुमार खोरेंद्र } ...........Geetha:
oh bahut badiya.... .......Gaurav vashist:
kitni achchi tarha se aap apne vichar rakhte hain, lajawab hai/ head of 2 u sir

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