शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

एकांत में उसी गीत को ...

नदी  पहाड़  जंगल तब भी थे....
.बिलकुल आज की तरह ....
तब से संगीत की तरह बहती आई है हवा 

पत्ते शाखाओं  पर उगना सीख रहे  थे  ...
कलियाँ टहनियों पर महकना सीख रही थी .....
सूरज को पहली बार तब देखा था ..नदी ने .....
और कोहरे की घनी परत को हटा कर .....
आकाश ने नदी को चूमा था ..पहली बार ...
तब से संगीत की तरह बह्ती आई है हवा ...

.नदी ..पेड़  और चट्टान की बातो को सुनकर -
हवा गुनगुनाने लगी थी ..एक गीत ..
वह पहला गीत आज भी जंगल की खामोशी में  
पत्तियों की हथेलियों पर अंकित है  ...

एक लहर हँस  रही थी लड़की की तरह .
चट्टानों  से लिपट कर  झूम रही थी ...
उसकी मुस्कुराहट का पीछा करते -करते ...
सुबह से दौड़ती ..धुप थक गयी थी ...
 चांदनी रात की गोरी बांहों में  
वह  हँसीं ..समा गयी थी .....
और जंगल की कोख से ..
गाँव ने जन्म लिया था ...
संगीत की तरह तब भी  बह  रही  थी हवा  

हवा के ओंठो से निकले ..
संगीत के सातों स्वरों को अलग -अलग गाँवो ने ..
अलग अलग सुनकर ...
अपने गीत के लिये  ..चुन लिया था ..एक -एक शब्द .-
शब्द मौसम मे घुलते रहे ..भाषाओ में  बदलते रहे ...
और ,... ,...मौसम बदलता रहा ..
हर पेड़ ..हर पत्तियों को ..
हर पत्थर ,हर आदमी  का ,रूप निरंतर निखरता रहा ..
और फिर  बन गया शहर 

मीनारों ,दीवारों ,सड़कों से घिरा     हुआ  -  शहर 
बहुत पीछे छोड़ आया पेड़ की तरह नग्न शरीरो को ..
उन गीतों को -जिसे  हवा ने सिखाया था आदमी को .....
और हवा हैरान है उपासको को सीढियों पर 
भग्न मन्दिरों की तरह तितर -बितर पाकर 

हवा की सांसो में  आदमी ने जहर भर दिया है ...
अब हवा लौट जाना चाहती है 
जंगल के एकांत में  उसी गीत  को  
सुनने  के लिए  -गाने के लिए  

किशोर कुमार खोरेन्द्र 

गजल सुनाती है रात

३-गजल सुनाती है रात 

पांवो मे घुंघरू बाँध कर नाचती है रात 
आवारा सड़कों  पर ..
बदनाम गलियों में  ...
रात भर भटकती है रात 

आकाश ओढ़ी  हुई  ...धरती की 
सोयी ...आँखों का सपना बनकर.
जागती है रात 

अनपढ़ और जवान लड़कियों को ..
.किस तरह छलता है शहर 
देह के बाजार मे ...अपना चेहरा तलाशती है रात 

प्लेटफार्म पर बैठी हुई  नव-वधु सी उंघती है रात ...
जंगल के एकांत मे पगडंडियों पर टहलती हुई 
कोई कविता  गुनगुनाती है रात 

बेरोजगार पांवो के इंतजार मे ...
दरवाजे पर बैठी हुई माँ की तरह ....
इंतजार करती है रात 

मुंह छुपाते  हुऐ  शहर को एक् बार ...
फिर  नग्न करने के लिए  ..
सूरज के आने का इंतजार करती है रात 

किशोर कुमार खोरेन्द्र 


कविता -अंश

१-पता नहीं कब उस आखरी आदमी का जन्म होगा ...जिसकी कवीता आखरी होगी और ...जीसे सुनते ही सारे लोग एक् हो जायेंगे ...लेकीन कवीता सुन रहे मेरे दोस्तों ..जान लो ..-पहली कवीता की तरह ही होगी वह आखरी कवीता / .......................२-.....एकांत के एकांत मे ...मै रहता हूँ ..निज -प्रान्त मे ..../बरसों या सदियों बीत गये ..न रह पाया किसी के साथ मे ..//जैसे चलती चीटियाँ पत्तो को नही काट रही ///इसी तरह आत्मा को भी देह बूंदों की परवाह नही ////{kishor कुमार } ..........3-मै ठहरा हुवा शरीर हूँ ..इसका अहसास कभी नहीं होता मुझे ...लगता है मेरा कद मेरी देह से बढा है ...किसी डिब्बे मे बैठा हुवा मेरा शरीर भागता चला जाता है रेल के साथ ....और मै छुट जाया करता हूँ अक्सर ...किसी जंगल मे उगे हुवे हजारों सागौन वृच्छो के पास ...{कविता अंश..kishor } .................४-......एक् बूंद प्रेम हूँ मै ....पर तेरे विरह का ,सागर जितना अहसास ....मुझे गिरने दो प्रभु !तुम्हारे चरण कमल मे ....नयनो मे तो सबके बनकर रहती ही हूँ मै प्यास ..{kishor कुमार }.

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2009

prtikriya

Jenny:
bahut sahi sir, kavi ki kavita hi to uski diary hoti hai. aapki rachnayen bahut khoobsurat hai. badhai kubool karen. meri rachnaon ko padhne aur tippani dene keliye shukriya. yun hin marg darshan dete rahen. shubhkamnayen. Jenny:
kishor ji, aapki ye rachna behad pasand aai...किसी कवी की कवीता पड़कर ..तृप्त होना कवीता है ,..कवीता न लिख पाऊ ,पर ..कलम लेकर बैट जाऊ ,...और कोरे पृष्ट को देखता रहू ,.यह भी एक कवीता है ...कवीता शब्दों में ,कवी में या किताबो में बंद नही है ,...कवीता तोस्म्पूर्ण आदमी के भीतर है ,..समय से उसका अनुबंध है ....आखरी कवीता का ...सबको इंतजार है ...{किशोर कुमार खोरेंद्र } meri rachnayen aap padh rahe, mujhe khushi hui. sarahna nahi sir aapka margdarshan chahiye, taaki mai bhi apni rachna me sudhar kar sakun, aur likhna jaari rakh sakun.

प्रतिक्रिया..२७-०२-09

......७-लेकिन क्या सचमुच में मेरे स्वप्न में धरती -माटी के सत्य से निर्मित ......आकाश की थाल में प्रज्वलित ..एक दिया है ...जिसमे जलती बा ती ने ...केवल प्रेम के अमृत को पिया है .................८लेकिन मेरे स्वप्न भी तो ..आख़िर धरती के ही है .........८-इसलिए ,.....क्या धरती भी किसी का सपना है ...?.........{kishor कुमार } VINOD BISSA:
achchhi rachanaa hai ..............७-लेकिन क्या सचमुच में मेरे स्वप्न में धरती -माटी के सत्य से निर्मित ......आकाश की थाल में प्रज्वलित ..एक दिया है ...जिसमे जलती बाती ने ...केवल प्रेम के अमृत को पिया है ॥?..?...............८-लेकिन मेरे स्वप्न भी तो ..आख़िर धरती के ही है .........८-इसलिए ,.....क्या धरती भी किसी का सपना है ............{kishor कुमार } ....Latesh,MyKrishna:
nice poem. Yadi yah dharti na hoti toh shayad panch tatva na hote aur fir hum manushya b na hote. Issi dharti hi saare sansar ka bhoj uthakar b vahi ki vahi tikki hai aur hume dharya bharane ki shiksha deti hai. .............गूंजा मौन गूंजा मौन यहाँ ....एकांत कलरव सी आहट है ..इस नीड़ की अमराई मे ..हर तिनको का svagt है ..खोजता चिडिया को .. उड़ती हुवी ..जैसे .. एक् पंख हो ..धुप सी यहाँ ठहर जाओ ..एक् टुकड़े आकाश सा उतर आओ ......{kishor कुमार खोरेंद्र } ...........Geetha:
oh bahut badiya.... .......Gaurav vashist:
kitni achchi tarha se aap apne vichar rakhte hain, lajawab hai/ head of 2 u sir

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009

सच ..!कैसे भी जन लू ...

१-पृथ्वी को बाल्टी की तरह उलट दू ........सागर के भीतर छिपा कोई तो होगा ..?..भाग न पाए ...उसे पकढ़ लू ............यही चाहता है मन ......सच कैसे भी जान लू / २-सदियों लग जाए .......इस तारे से उसतारे .......बिन हारे मै जाऊ ........ब्रम्हांड में रहता कही तो वह होगा ?चरण छू लू उसके ....यही चाहता है मन ....सच कैसे भी जान लू //..३-साकार नही वो क्या निराकार है ....कैसे मानू मेरा मालिक किस प्रकार है ...संसार अगर बहुत विशाल है ..?..लगता शीशा उसका फोड़ दू ....परछाइयो की भीड़ में छिपे उन्हें फ़िर ....एक टुकड़े दर्पण सा खोज लू ....यही चाहता है मन ...सच कैसे भी जन लू ///..४-पर मित्र मेरे तुम कहते हो सत्य जानना अति सरल ..........बैठ जाओ एकांत में ....मौन हो मगन .....ज्ञान मिलेगा जैसे ध्यान से ..बीज में होता है अंकुरण ...मित्र मेरे तुम्हे नमन ..तुम्हे नमन ...////......समाप्त

प्रतिक्रियाये..दिनांक .२६.०२..09

Girish:
vah!! Girish:
वैरी गुड. .....,,,Girish:
अच्छा लिखते है ..........Girish:
really nice. ................meri kvita ..1.tum ek vrichchh ho ..2.. kvi mitr ...3....gilhrio sa kutr rhe .....४..तुम्हारे गमले में गुलाब सा खिल गया हूँ .........आदि पर गिरीश जी के कमेंट्स .........../.....कवि धीरेन्द्र:
namaskaar aapki rachnaaye padhi sundar ati sundar.......aajkal kuchh vyast rahta hu ........ १-गोल धरती ....जैसे पानी की एक बूंद ...उसके सपनों के महासागर से उछलकर ..मछली की तरह मै ....कहां जा पाता हू बाहर ......अमन:
nahi mene dekha nahi tha isliyepuch liya aapki kal ki dono rachna bahut achhi लगी..............DURG SINGH:
Respected Kishor Ji sir,Your writings are excellent. It is also beautiful piece of work. You are exalted and noble soul. I heartly appriciate your work. Please keep sending such soul touching poems. I am waiting for new one. Accept my humble respect sir. ..................arun:
भाई साहब आप जैसा लिखना कब सीखूंगा ............

प्रतिक्रियाये..

Girish:
vah!!

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2009

स्वप्न ,..यह धरती का है ...

svpn ,..yh dhrti ka hai ...
स्वप्न .यह धरती का है .. १-गोल धरती ....जैसे पानी की एक बूंद ...उसके सपनों के महासागर से उछलकर ..मछली की तरह मै ....कहां जा पाता हू बाहर ......२-लौट आता हू .....शहर से गाँव ...गाँव में अपने घर आंगन ....३-फ़िर विचारो के जलाशय में ....डूबे हुवे मन को ...ढूडने के लिए बैठा रहता हूँ ....बिछा कर एक जाल......४-स्वप्न यह धरती का है ....पर डूबा रहता हूँ मै ...कभी ..अहंकार से गले हुवे नाक सा / टपक जाता हूँ ....साकार हुवे घाव से ?पट्टियो की तरह भींग जाता हूँ ....किसी के कश् में धुंवो सा छितरा कर अदृश्य हो जाता हूँ .......गरीब -फुटपाथ के किनारे सिक्को सा उछल जाता हूँ ....५-और फ़िर चढ़ने -उतरने के दर्द को पग-dndiyo सा ...पहाडे की तरह रटता हूँ मै ....या काँटों को फूल समझ कर चलते पांवो को छालो सा -जीता हूँ मै ...६-मेरे स्वप्न में धरती ..कभी ..एक गोल हवाई झुला है ..जहाँ से कूदना मना है ....मेरे स्वप्न में धरती -कभी -बदनाम पालीथीन से बनी ..अन्तरिक्ष के शहर में भटकती ...हवा से भरी एक झिल्ली है ...जिसे छूना मना है ......७-लेकिन क्या सचमुच में मेरे स्वप्न में धरती -माटी के सत्य से निर्मित ......आकाश की थाल में प्रज्वलित ..एक दिया है ...जिसमे जलती बाती ने ...केवल प्रेम के अमृत को पिया है ॥?..?...............८-लेकिन मेरे स्वप्न भी तो ..आख़िर धरती के ही है .........८-इसलिए ,.....क्या धरती भी किसी का सपना है ............{kishor कुमार }

स्वप्न .यह धरती का है ..

१-गोल धरती ....जैसे पानी की एक बूंद ...उसके सपनों के महासागर से उछलकर ..मछली की तरह मै ....कहां जा पाता हू बाहर ......२-लौट आता हू .....शहर से गाँव ...गाँव में अपने घर आंगन ....३-फ़िर विचारो के जलाशय में ....डूबे हुवे मन को ...ढूडने के लिए बैठा रहता हूँ ....बिछा कर एक जाल......४-स्वप्न यह धरती का है ....पर डूबा रहता हूँ मै ...कभी ..अहंकार से गले हुवे नाक सा / टपक जाता हूँ ....साकार हुवे घाव से ?पट्टियो की तरह भंग जाता हूँ ....किसी के कश् में धुंवो सा छितरा कर अदृश्य हो जाता हूँ .......गरीब -फुटपाथ के किनारे सिक्को सा उछल जाता हूँ ....५-और फ़िर चढ़ने -उतरने के दर्द को पग-dndiyo सा ...पहाडे की तरह रटता हूँ मै ....या काँटों को फूल समझ कर चलते पांवो को छालो सा -जीता हूँ मै ...६-मेरे स्वप्न में धरती ..कभी ..एक गोल हवाई झुला है ..जहाँ से कूदना मना है ....मेरे स्वप्न में धरती -कभी -बदनाम पालीथीन से बनी ..अन्तरिक्ष के शहर में भटकती ...हवा से भरी एक झिल्ली है ...जिसे छूना मना है ......७-लेकिन क्या सचमुच में मेरे स्वप्न में धरती -माटी के सत्य से निर्मित ......आकाश की थाल में प्रज्वलित ..एक दिया है ...जिसमे जलती बा ती ने ...केवल प्रेम के अमृत को पिया है .................८लेकिन मेरे स्वप्न भी तो ..आख़िर धरती के ही है .........८-इसलिए ,.....क्या धरती भी किसी का सपना है ...?.........{kishor कुमार }

बुधवार, 18 फ़रवरी 2009

prtikriyaye

१-rajesh bissa:
किशोर भाई आपकी कविता सत्य का आईना है ..shaskt prhar भी ......और बहुत अच्छी है ...२-मेरे चेहरे कौन:
aap ne to dil jeet liya- ..................३-अमन:
bhut achhi lagi sir apki rachna ............................४-अमन:
sir sach itna gahan arth li hui hoti hain apki rachna man ko ajib chhuvan hoti hainhame bahut kuchh sikhne ko maul raha hain ..........५-..........................कवि धीरेन्द्र:
मैंने खूब रचनाएं पढ़ी एक से एक विद्वान कि किन्तु आपने बहुत ख़ास विचार तलासे हैंऔर उन्हें नज़मो का नाम दिया वाकई बहुत ही सुन्दर

प्रतिक्रियाये

1-rajender:
सर , आप तो बडे विद्वान् लेखक है क्या आपने कुछ किताबे भी लिखी है २........мєєиα:
aaj ka kavitha bahut hi sundar thi .. hope all well wid u n ur family ३- RaJiV sHaRMa:
बहुत सुन्दर किशोर जी ..शुभकामना ............................४-.......MURLI MANOHAR:
..धुप सी यहाँ ठहर जाओ ..एक् टुकड़े आकाश सा उतर आओ ......kya baat hai.......bahot khoob.... ..............५- Devanand:
Wah Wah sahi hai
nice kavita ...........६-....VINOD BISSA:
वाह ..... किशोर जी सादर वन्दे ...

विभिन्न कविताओ पर ..प्रतिक्रियाये

१-ratnesh:
kya khub likhate hain aap ,२-..arvind sharmaहर:
सर जी बहुत सुंदर शानदार ,.३-..Latesh,MyKrishna:
i read it its really nice. Keep it up.४- Jayajyoti:
One thing Kishor ji...Your creative writing is so great. I would request you that please publish these poems...Then others will have also the chance to read thse marvels...


Feb 18 (22 hours ago)
Jayajyoti:
Its too great...Both the poems are so great that one have to really concentrate to find out which one is the greater...Those are simply beautiful my dear friend............
wah wah ,५-..अमन:
late reply kiya sryapke man ke bhav saf nazar aate hain isse hum logo ko sikhne ko bhut kuch milta hain ki bahv ka chitran bina rango ke kaise kiya jata haindhanyawad ,....

पेड़ की पत्तियों पर छपी है कविता पर कमेंट्स


Feb 18 (21 hours ago)
अमन
..
sir apki rchna man tal pahuchti hain, sach me

8:14 pm (13 hours ago)
श्रद्धा
aapki soch bhaut alag bahut ghari haijab jab aapko pada hai aapki soch ki udaan se prabhvit hui hoon

8:18 pm (13 hours ago)
कवि धीरेन्द्र
bahut hi achchha .अद्भुत
श्रद्धा
aapki soch bhaut alag bahut ghari haijab jab aapko pada hai aapki soch ki udaan se prabhvit hui hoon

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

मेरी पत्नी ...

१-उसके पास ..उसके साथ रहा ...जैसे मेरी देह मेरे पास ..मेरे साथ रहती है ...अपने भीतर के आकाश में ..घूम रही पृथ्वी की तरह ..खोजता रहा ..उसके पास एक सूरज ....२-उसके पास उसके साथ रहा ..जैसे पृथ्वी अपने सूरज के साथ रहती है ..लेकिन उसे पुरी तरह से मालूम नही था ..की ..वह मेरी देह है ..वह मेरा सूरज है ..उसे पाकर मै विदेह हो गया था..उजाले से भरा ..पुरा आकाश हो गया था ..३- मै अगर पत्ता था तो वह मेरा हरापन थी ..मै यदि फूल था तो वह मेरा रंग थी ..मै यदि धुप था तो वह मेरी आंच थी ..४-लेकिन क्या मै उसका सूरज ..उसकी देह बन सका हू ...{kishor कुमार खोरेंद्र }

कविता जो पेड़ की पत्तियों पर छपी है ..

एक शब्द या एक किताब को पढ़कर ...
किसी  पेड़ से उतरती गिलहरियों को देख कर ....
या भिखारी के कटोरे से मांग कर .
.किसी भी तरह से खोजकर ..
एक कविता की नकल करनी है मुझे ..

जिस पेड़ की पत्तियों पर कविताये छपी हुई हैं ..
वह  एक पेड़ सदियों से ठहरा हुआ  है कही पर ..
इस पेड़ को तलाशु..या मन से लिख लूँ  
एक झूठमुठ की कविता ..
कविता लिखने से  
ज्यादा  जरूरी है उसे खोजना .

तुम्हारी जेब में रुपयों की जगह ..
कविता हो तो दे दो ...
कविता ही चाहिए मुझे रुपया नहीं ......
कविता से मै खरीदूंगा . एक रास्ता ..

जो उस पेड़ तक जाता हो 
जिसकी पत्तियों पर लिखी है ..वह कविता ...
जिसे मै तलाश  रहा हूँ 

किशोर कुमार खोरेन्द्र 

गूंजा मौन

गूंजा मौन यहाँ ....एकांत कलरव सी आहट है ..इस नीड़ की अमराई मे ..हर तिनको का svagt है ..खोजता चिडिया को .. उड़ती हुवी ..जैसे .. एक् पंख हो ..धुप सी यहाँ ठहर जाओ ..एक् टुकड़े आकाश सा उतर आओ ......{kishor कुमार खोरेंद्र }

सोमवार, 16 फ़रवरी 2009

आदमी और शब्द ...

१-रेत से बने शरीरो से झर रहे अशंख्य ..शब्दों में से कोई एक शब्द उछल कर राह में मेरे साथ हो लेता है तब मै फ़ीर ..टीलो की तरह उड़ चुके ...उस आदमी को शब्दों की तरह महसूस कर ...हाथ मलता रह जाता हू .. ...२-या पग -डंडियों सा भटकता हुआ ,..पानी के इंतजार में सुखी नदी सा ठहरा हुवा हू ... ...3-मै क्या ठीक -ठीक वही एक शब्द हू जो किसी कवीता में अनलिखा रह गया हो .. .....4-इसलिए क्या मै एक प्यासा शब्द हू ..जो समुद्र से उछल कर रेत पर गिरे हुए किसी खारे बूंद की तरह सोख LIYA गया हो ...........5-जडो में छिपी हुई अंकुरण की सम्भावनाओ को टटोलना चाहता हू ,...आत्म-विश्वास को जानना चाहता हू ,..लेकीन यह सच है ,,शब्द न आदमी है .आदमी न शब्द है ...समय का सच आदमियों और शब्दों की परवाह नही करता . {kishor कुमार खोरेंद्र }

आदमी को आदमी तो रहने दो ...

१-टूट कर न बिखर जाये आदमी ,साकार सपनों को होने दो ......पतझड़ के दर्द को समझो जरा ,शाख पर कोपले नई फूटने दो ,...एकांत की तपस्या पर मत हंसो ,वृच्छो को जंगल पर एतबार करने दो ,...


२-लौट कर नही आती नदी तो क्या , पहाड़ के दर्द को पानी की तरह रिसने दो ,...उस पार मालूम नही क्या है , इस पार तो हमे जीने दो ,॥पत्थरों को भगवान बना दिया टिक है , अब आदमी को तो आदमी रहने दो ...{किशोर कुमार खोरेंद्र }

मानव आकर लिए ..

भीतर मेरे दर्दो से भींगा कया खारा जल है ,arsshu से नम हुआ समर्पण फीर किसलिए ,मै एक कण मरुथल सा ,प्यासा,शुष्क अधर लीये ,/ घूम रहा होऊ जन्मो से ,पृथ्वी सा तन्हा , रीक्त आकाश में जैसे मानव आकार लीये ,/स्नेह पाना है तो ,जलना ही होगा ,...हाँ मै तप सकता हूँ ..फीर सदीयो तक ...priye तेरा प्यार लिए ..} (प्यार का मतलब है भक्ती} {kishor कुमार खोरेंद्र }

प्रेम करना सीख गया हू ..

मै घर में,.खिड़की से पहुंच कर ,..फर्श पर बिछ गया हू या तुम्हारे गमले में ,..गुलाब की तरह खिल गया हू ,...मै धुप हू ..तुम्हारे करीब से सुगंध की तरह गुजर गया हू ,..क्या मै अब सचमुच प्रेम करना सिख गया हू अब चाहने का अर्थ समझ गया हू जो मुझे चाहते है उनकी ओर लौट गया हू ,...{किशोर कुमार खोएर्न्द्र }
"Therefore I say to you ,whatever things you ask when you pray, believe that you receive them , and you will have them ..{Jesus}" ..............wisdom is the ending of suffering .ending of the suffering means the observation ..just to see suffering ..let it flower ..not to go behind it ..it covers the whole of man"s endeavour ,his thoughts ,his anxiety, everything{j.krishnamurti}

यह भी एक कविता है ...

किसी कवि  की कविता  पढ़कर  ..
तृप्त होना कविता  है ,..
कविता  न लिख पाऊँ  ,
पर ..कलम लेकर बैठ  जाऊं  ,...
और कोरे पृष्ठ  को देखता रहूँ  ,.
यह भी एक कविता  है ...
कविता  शब्दों में ,कवि  में 
या किताबो में बंद नही है 
कविता  तो सम्पूर्ण  मनुष्य  के भीतर है ,..
समय से उसका अनुबंध है ....
आखरी  कविता  का ...
सबको इंतजार है ...

किशोर कुमार खोरेंद्र

कविताओ के कुछ अंश ..

आतंकित शब्दों को ,गिलहरियों सा ..सब के मन कुतर रहे है ,..अहिंसक वाक्यों के तिनको से ,घोसले नये बन रहे है ,...फ़ीर फुट न जाये कोई अपरिपक्व विचार ,..चितित चिडियों सा हम डर रहे है ,,....,घूम कर फ़ीर लौट आता है आतंक ,घायल कबूतरों को अब तक ढूंढ़ रहे है ,..गौरया ने टहनियों से कहा है ,बात पहुंच गयी है जडो तक ....{kishor कुमार खोरेंद्र }........2- नदी में जल-लहरों की हलचल ,जंगल के अंधेरो में घूमते धुप के संग ,सूखे पत्तो की आहट ,vrichchh तो आज भी नही पूछते मेरा नाम ,शब्दों से अब कैसे बनाऊ एक सवाल ,उत्तर मीले जीससे सबसे एक समान ,..३-.{मेरी भीतर मेरे दर्दो से भींगा कया खारा जल है ,arsshu से नम हुआ समर्पण फीर किसलिए ,मै एक कण मरुथल सा , प्यासा,शुष्क अधर लीये ,/ घूम रहा होऊ जन्मो से ,पृथ्वी सा तन्हा , रीक्त आकाश में जैसे मानव आकार लीये ,/स्नेह पाना है तो ,जलना ही होगा ,...हाँ मै तप सकता हूँ ..फीर सदीयो तक ...priye तेरा प्यार लीये ...{मेरी कवीता से } (प्यार का मतलब है भक्ती} ......{kishor कुमार खोरेंद्र }

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कवीता का अंश } ....3-

यात्रा के तीर्थ तक पहुंचना है ..

बंद मुट्ठी के भीतर ..मन को 
पेपर वेट कीतरह ..दबा रहा हूँ 
अपनी सघनता और अपने वजन का  
जैसे अनुमान लगा  रहा हूँ   
फाइलों में छिपी आँखों को ..खिड़की के उस पार ..
खिले फूलो तक ..पहुँचाना  चाह रहा हूँ ...-
कुर्सी का कवर बन चुकी देह को ..
अब नई कमीज की तरह सिलवा  रहा हूँ ..
शायद मै पेपर वेट ,फाइल या कुर्सी होने से बच जाऊँ  ...
चढ़ती हुई सीढियों  से ..
अब उतर जाऊं  ..छपे हुऐ  नाम सा ..अख़बार में मै 
सिर्फ कैद न रह जाउं  
एक बार ही सही ..कोट की तरह शरीर से उतर कर ..
किसी के आंसू ..रुमाल सा पोंछ  पाऊँ  ....
और आंगन तक पहुंच आये ..दूबों से पूंछू ..
कुंवें  मै रीस आये नये जल से जानूँ  ..
बबूल या धतूरे के पेडो से ब्याकुल खेतो के बारे में  ...
सुई की नोंक  से घायल कथरी को  ...
ओढे हुऐ लोगों के लेकर 
 ..लौटती हुई ..ट्रेन   के दर्दों ..के बारे मेँ  ...
क्या जिन्दगी  सचमुच ...एक असमाप्त रेल यात्रा तो नही .....
तो मुझे भी इस यात्रा के तीर्थ तक पहुंचना ही है ..

किशोर कुमार खोरेन्द्र 

सत्य निराकार है ..भाग --७..,८..,

६-माँ के प्यार की आंच ..धुप की तरह है ..इस घोसले के हर तिनके में ..गाठो की तरह सुरक्षित है सत्य ..७-दर्पण का एक टुकडा भी तो आखिर एक सम्पूर्ण आइना ही है ..अब टुकड़े -भर आईने में ..खुद को छोड़कर ..बच्चो के लीये निशचिंत चिडिया ..खेतो से दाने लेन जायेगी ..दूर -दूर .तक ८-तब तक क्या ..प्रतिबिम्ब को ...चिडिये की तरह उड़ने से रोक पायेगा सत्य .....वैसे .भी .सत्य ..को..दर्पण की आवश्यकता नही है ..." सत्य तो निराकार है न ".....{kishor कुमार खोरेंद्र }.

भूख ही सत्य है

आकाश उड़ रहा है 
चिडिया के संग .
चोच में तिनके की  तरह दबा हुआ  .है .
आईने से चुराया हुआ  एक टुकड़ा  प्रतिबिम्ब ..
डर है ..छूट  न जाये ..
चिड़ियाँ  कही गिर न जाये ..
शीशे की तरह वह टूट  न जाये .. 
 प्रतिबिम्ब में एक घोसला है ..
और घोसले में अंडो के भीतर 
साँस ले रहा है ..धरती  का सत्य .
सपनों की तरह पल भर में 
मीलों  दूरी ...तय कर रहे है पंख ...
टहनियों के पत्ते .हवा से कह रहे है ..
रुक जावो ..
.वृक्ष  हाथो को फैलाये ताक रहा है  ऊपर .....
शायद गुलेल के निशाने पर है चिडिया ... . 
अच्छा हो इस बार भी निशाना चूक  जाये ..
बच जाये चिडिया ...
और प्रतिबिम्ब का एक टुकडा भी ... 
घोसलें  में अभी -अभी जन्मी नन्ही चिडिया भी..
बंद आँखों से.. क्या ....? 
देखना चाह रही है अपना .. प्रतिबिम्ब ...
लेकीन ...खुले चोंच को दानो का इंतजार है ...
भूख ही सत्य है 

किशोर कुमार खोरेन्द्र 

तुम ..

१-तुम एक वृच्छ हो ..बान्हे फैलाये खडी हो ..तुम एक जंगल हो ..प्रेम से भरे सम्पूर्ण एकांत की तरह ..मुझे बुला रही हो ...तुम पहाड़ के शिखर पर ....अटकी हुई चट्टान सी .क्या मेरा सदियों से इंतजार कर रही हो ...२-तुम एक नदी हो ...और मुझे सीखना है बहना ..घुल जाना ..जैसे एक् सागरके भीतर ..नीरव हो जाता है ..किसी ज्वाला-मुखी का फूटना ३-जैसे शब्द -विहीन संकेतो की तरह ॥अंकित हो जाता है रेत पर पवन का अपने प्रियतमा सेकुछ कहना ..४-और शहर की भीढ़ मै आवाजो के मध्य ..अपनी परिधि से बाहर होकर ।मेरा बूंद से सागर हो जाना {kishor कुमार खोरेंद्र }

विचार ..

MITR हर मनुष्य ..कवी अवश्य है ..कल्पनाओं को साकार करना ही ..मानव धर्म है ..वह चाहे साइंस के या आध्यात्म के ..स्तरों पर हो ...इसलीये ..कवीता ... स्वयम मै महत्व- पूर्ण है -वैसे तो जीवन मै हिंसा और असत्य ...?..सत्य और अहिंसा की तुलना मै बहुत कम है ..सम्पूर्णता से ..देखे तो ...!.. व्यापक सत्य की झील मे बर्फ के तैरते हुवे टुकड़े है ..{kishor कुमार खोरेंद्र}

नदी मै जल सा रह गया हू ..{५}

५-या ..ओझल होते हुवे .अपने समर्पण के दोने में जा बैठा हू ..स्वयम से बिदा लेता हुआ ..मन्त्र -मुग्द प्रवाह के संग /...माफ़ करना दोस्तों ..मै अब बह गया हू ..नदी में जल सा रह गया हू ..मै सचमुच ...पहाड़ और समुद्र के बीच ...एक अंतहीन पगदंडी सा ..इस पृथ्वी के संग ..चल गया हू ..{किशोर कुमार खोरेंद्र } }

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नदी मै जल सा रह गया हूँ ...

1-एक रास्ता भी है ..फ़ीर ठहराव और ..तीव्र गति भी है ..पहाड़ पर नदी के लीये /प्रपात में समाहित ..बूंदों के गुच्छो ने ..सम्मोहित कर जैसे ओड़ लिया हो ..अनंत आँखों को२-विस्फरित आँखों की तरह पसरी झील से ..झांक रहीं है ..झिलमिलाती अनेक प्रस्तर मुर्तिया /जल में निमग्न ..नाविक की लाल गुलाब सी कमीज में डूबा हुवा पतवार ..बार -बार उकेर रहा है ..जलीय कांच पर नूतन इन्द्र- धनुषीय तस्वीरे / ../ ३-इस महा -दृश्य में मै ..स्वयम किसी टहनी में ..उगे हुए हरे पत्ते सा खुश हू /या ..किसी चट्टान के निचे ..दबे रेत-कणों सा चुप हू ..या ..झील के दर्पण से परावर्तित .किरणों की तरह डूब कर नम न हो पाने का दुःख भी है मुझे / ४-मै कहा पर हू ..?ठीक नदी के उदगम पर -साकार होता हुवा ..या ..ठीक प्रपात में तुडा -मुड़ा संघर्ष -रत ...या झील की सतह पर शांत सा स्थिर .. या उस तटीय झोपडी से उठ रहे धुंए की तरह -सर्वत्र तो नही ..?../ ५-या ..ओझल होते हुवे .अपने समर्पण के दोने में जा बैठा हू ..स्वयम से लेता हुआ ॥मन्त्र -मुग्द प्रवाह के संग /...माफ़ करना दोस्तों ..मै अब बह गया हू ..नदी में जल सा रह गया हू ..मै सचमुच ...पहाड़ और समुद्र के बीच ...एक अंतहीन पगदंडी सा ..इस पृथ्वी के संग ..चल गया हू ..{किशोर कुमार खोरेंद्र }

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प्रशन या उत्तर ...

१-कवीता प्रशन भी नही ..न उत्तर है ..बिलकुल आदमी की तरह क्या .है निरुत्तर 2-वृच्छ से अभी -अभी गिरा हो जैसे एक पिला पत्ता ...उड़ते हुवे पक्षी से जैसे अभी-अभीअलग हुवा हो एक पंख टुटा ... ३-पानी की तरह शब्दों को पीकर भी ..मनुष्य जैसे रह जाता हो रीता.. ४-प्रति-उत्तर के संकेत..रेत में लिखे किसी मन्त्र की तरह ..लहरों ने मिटा दीये ..पग -डंडियों में अंकित हुए पद- चिन्ह सभी ..तिलक सा पाषानों ने अपने उपर छाप लीये .. ५-पत्तो ने हरी स्याही से अब क्या लिखा है ..पंखो की उडानों मेअब कौन सा नया आकाश बसा है ... ६-कवीता को पर स्मरण है सभी नदी ..भागती धारा को पर कुछ याद नही ..कविताओ को एक बार सम्पूर्णता से ..फ़ीर पढेगी जरुर ..लेकीन नई सदी ..घुमती धरा का यह विश्वास ..अटल है सही ...{किशोर कुमार खोरेंद्र }

मेअ कविता लिखता हूँ ..

१-उसने पूछा ..तुम क्या करते हो ...कवीता लिखता हू ..जैसे कोई पोधा उगता है ...मैंने कहा ....शहर मेरे पडोस में था ..रेत पर से उसे लौटते हुए ..समुद्र की तरह देखता रहा .. 2-मै उन्हें जो सडको पर चल रहे थे उन्हें जो गलियों में ढूंढ़ रहे थे समुद्र ...उन्हें ...अपनी कवीता सुनना चाहता था .३-जल की नमकीन कवीता ..हिम -शिलाओ की स्वतंत्र कवीता ..द्वीपों के ठहराव की कवीता ...४-लेकीन ..सम्पूर्ण शहर बारूद पर बेसुध सोया हुवा था ...लहरों की तरह मै उन तक पहुच रहा हू ...मेरी कवीता उन्हें एक जुट होकर गर्जना जरुर सिखा देगी ....{किशोर कुमार खोरेंद्र }

कविता -लिखना ...

१-कवीता लिखते -लिखते पता नही चला ...कब शाम हो गयी ॥कब धुप मुझे छोड़कर चली गयी ...भूख नही लगी ..न पानी पिया न ही गुस्सा आया ..न किसी की याद आई ...घडी के कांटे की तरह मेराकुत्ता मेरे आस-पास घूमता रहा ... २- न आंगन में पोधे से झरे पत्तो या फूल की पंखुरियों को मैंने उठाने की कोशिश की ..अपनी कमीज ,अपनी देह ,,..से अपरचित ..होता गया .. ३-लिखता गया ..या चलता गया अपने अंदर के एक और भीतर में ...जहा पर शब्द छन -छन उग रहे थे ..शब्द मुझमे भरते जा रहे थे ..और मै वरषा की बूंदों की तरह शब्दों के जलाशय में डूबता जा रहा था ...{किशोर कुमार खोरेंद्र }

ये मेरा चेहरा है ..

१-ये मेरा चेहरा है ये मेरी बाते है ,जो लोग दर्पण से है मेरे करीब आते है ,...मै वो प्याला हू जिसमे भरे जहर को मीरा पी गयी थी ,मै वो पत्ता हू जिसपर पहली कवीता कालिदास ने लिखी थी ,.मै वह पगदंडी हू जिस पर आज भी बुद्धः के पांवो के निशान मौजूद है .....ये मेरा चेहरा है .....{kishor कुमार खोरेंद्र }

कवी -मित्र

१-जैसे एक kavi mitr ...सौप गया हो टोकरी में भरे फूलो कीतरह अपनी ..कविताओ से भरी प्रिय डायरी ....और वह अब भी डायरी के पन्नो के ..हाशियों पर फैले हुवे बूंद में स्याही की तरह हो वः उपस्थित / २-मुझ ऐसा ही लगता है ॥कविताओ में जैसे शब्दों की तरह ..जड़ाहुवा वह रह रहा हो सुरक्षित ...अनलिखी कविताओ के इंतजार में ..कोरे पन्नो के बीच ...पन्खुरियो सा दबा- दबा आज भी जैसे चिन्तन में हो लिप्त .. ३-अनाम कवीता की पंक्तियों के बीच ..जैसे मछली की तरह ..छंद की पकड़ से ..बाहर हो गये एक शब्द सा हो मुक्त ...किसी बर्थ में ..भूले रह गये ..खादी के रुमाल की तरह ....या टूटे हुए फूलों की तरह ...एक पवित्र याद रह गया मुझे मेरा कवी MITR ..{किशोर कुमार खोरेंद्र }

अपनी ..धर्म -पत्नी के लिए ...

1-तुम्हारे आंसुओ को छत पर रख आया हू ॥सुख को उतरने दो ..धुप की तरह ।सीढियों से आंगन तक ..खीलने दो पुष्पों को ..तुम्हारे विश्वास के गमलों मे ..रंग लो दीवारों को हरी इच्छाओ और पवित्र श्वेत -कामनाओ से .. २-दुखो को धोकर तार पर सुखा दो ..टंगे रहने दो उन्हें ..बरसों तक ..बेटे के लीये उमढ आये प्यार को ढक कर रख दो ..कही वह ठंडा न हो जाये ..बेटी के मायके आने से पहले ..पसंद कर लो साडिया और रंगीन चुडिया... 3-अडचनों को कह दो ..अब न आये इस घर मे चीटीयों की तरह झुंड मे दुबारा ..ताकी .मीठास बनी रहे ..दाल मे नमक की तरह .. ४-सहेज कर रखे रहो ..उन बर्तनों को जीनकी आवाज ..सडक तक न जाये ...एसे कुछ कपडे ..जिनके फटने से ..शर्म को लाज न आये .. ५-कुछ दाल .कुछ चांवल और दो रोटियों से भी ..ज्यादा जरूरी है ..अपने छोटे से बगीचे मे ..दूब की तरह ..हरे -हरे शब्दों को उगाना ...तुलसी की जडो मे पानी की तरह भर जाना ..चुराये इससे पहले ..गुलाब बच्चे को सौप देना ...घृणा .प्यार मे तब्दील न हो जाये ..तब तक पढोस मे ठहरे रहना ..यही तो प्राथना है और पूजा ...{kishor कुमार खोरेंद्र }

देह को ...

मन्दिर की सीढियों पर चड़ने से पहले॥देह को जूतों के करीब मैंने रख दिया {kishor kumar khrendr }

जब मै कविता पढ़ता हूँ

जब मै कविता  पढ़ता हूँ 
पत्ते पर बैठ  कर चीटियों सा 
नदी पार करने लगता हूँ  ,.. 

जब मै कविता  सुनता हूँ  ,..
सीधे जडो में पहुँच  जाता हूँ 
फिर  पानी की तरह शिराओ में 
पहुँच  कर 
पत्तो की तरह हरा हो जाता हूँ  

जब मै कविता  के लिए शब्द चुनता हूँ  
.तब दुःख  सीढ़ियों से उतरने लगता है  
इन्द्रधनुष की तरह 
मेरे मन में उल्लास उभरने लगता है 

.जब मै  कविता  लिखता हूँ  
,कन-पटियों में गर्म लोहा पिघल कर ,.
.लेने लगता है विभिन्न आकार ...
तब घास के दर्दो से चुभ जाते है मेरे पांव 

जब मै कविता  समाप्त करता  हूँ .
कृष्ण की बांसुरी  की सुनाई देती है 
सूदूर  से आती हुई मिट्ठी तान 

किशोर कुमार खोरेन्द्र 

मेरा परिचय

१-पता नही वो आदमी है या एक् शब्द ..या अभी -अभी ..पौधे मे ..खीला हुवा कोई फूल .या फ़ीर ओंस बूंद मे झाकता हुवा मेरा चेहरा २-हर तरफ मेरीही परछाई है ..मै चाहता नही ..फ़ीर भी .सर्वत्र दिखाई देता हू ..नदी की देह सा ..मै ..समूचे आकाश को ओड़ कर बहता हू ..३-इसलीये मै कहता हू ..मुझे धरती कह लो ...या पहाड़ से उतरती हुई ..एक् पगडंडी ही मान लो ..या फ़ीर मन्दिर मे जलते हुवे ..दीपक का दर्द समझ लो .. ४-मै सीडीयों की तरह उतरा हुवा हू ..सबके इंतजार मे ..प्यार सबमे ..सबके लीये ...है -प्यार एकाकी हो नही सकता {kishor कुमार खोरेंद्र }

किताबो को ख़ुद पर नाज है ..

वो सब बच्चे जो  पाठ शाला  नही जाते ..हमे नही पढ़ पायंगे ..
किताबें  उदास है ..
हमे कौन पढ़ेगा  किताबों  को इंतजार है ..
किताबें उदास है ..
किताबों  के पन्नों में  कई कहानियाँ ..कैद  हैं ..
वक्त नही है उन्हें पढ़ने के लिए  किसी के पास 
और वक्त के पास है ..
किताबों  के ढेर .
किताबें  उदास है 
यूँ तो हर औरत ,हर बच्चा ..और हर आदमी  एक एक  किताब है ..


-फिर  भी और -और किताबों  के लिखे जाने का-
किताबों  को इंतजार है ..
एक् वेश्या ,एक् अनाथ बच्चा ,एक् भिखारी ..
शब्दों की आँखों मे आंसुओं  सी 
भरी है सबकी कहानी ..
पता नही वो   एक किताब  कब लिखी जायेगी ..
जिसका किताबों  को इन्तजार है .... 

फिर  भी किताबो को खुद पर नाज है ...
आखिर हरमोड़ से आगे  बढ़ने  के लिए  इन्ही के पास तो 
सुनहरा राज है .

किशोर कुमार खोरेन्द्र 
मुझे देखना मगर छूना नहीं ..अजीब शर्त है ..ऐ .जीन्दगी मै हैरान हू तुमसे जन्मो बाद मिलने का क्या अर्थ है ...{kishor }
मै एक् पत्ता टूट कर गिरा हुवा ..हवा मे बस् रुख बना हुआ ..स्नेह अगर मिलता रहे तो धूल भी चन्दन हुवा ...शाख पर चेतन जमीन पर अचेतना हुवा .. दिल अब भी धडक रहा पर..बोलना मना हुवा {kishor }
१-वहा नदी जैसे लौट कर ॥बूंद बन गयी थी ॥स्रोत से एक् बिज से ..जैसे पानी की धराये फुट गयी थी ..बूंद ने कहा -मै आइना हू .. मेरेभीतर ..नदिया और साग२-है ..तुम्हारी अनंत प्यास को ..बर्फ की तरह ..सम्भाल कर .रखा है मैंने -अपने भीतर .. ३-बूंद नेफैला दी बान्हे ..और मै ..जन्मो से प्यासे ..किसी सागर की तरह ..उसमे समा गया .. ४-मेरी यात्रा समाप्त हो गयी थी ..न भीड़ थी न मेरी इच्छाए ..न गाँव था न शहरो सी दुविधाये ..मेरे कपडो ने उतार दिया था ...मेरा आवरण ..तभी तो ..पानी की एक् बूंद ने ..स्वीकार ..कीया था ..मेरा मअहा- समर्पण {kishor }

कविता

मै एक् पत्ता टूट कर गिरा हुवा ..हवा मे बस् रुख बना हुआ ..स्नेह अगर मिलता रहे तो धूल भी चन्दन हुवा ...शाख पर चेतन जमीन पर अचेतना हुवा .. दिल अब भी धडक रहा पर..बोलना मना हुवा {kishor }

शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

kavita

किसी कवी की कवीता पड़कर ..तृप्त होना कवीता है ,..कवीता न लिख पाऊ ,पर ..कलम लेकर बैट जाऊ ,...और कोरे पृष्ट को देखता रहू ,.यह भी एक कवीता है ...कवीता शब्दों में ,कवी में या किताबो में बंद नही है ,...कवीता तोस्म्पूर्ण आदमी के भीतर है ,..समय से उसका अनुबंध है ....आखरी कवीता का ...सबको इंतजार है ...{किशोर कुमार }